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युजीसी सामाजिक न्याय के नाम पर भाजपा का सबसे बड़ा धोखा-नायक

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। युजीसी इक्विटी नियम सामाजिक न्याय के नाम पर भाजपा का सबसे बड़ा धोखा है। सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप ने सत्ता की पोल और सत्ता का अहंकार को सामने ला दिया है।

उक्त बातें झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता विजय शंकर नायक ने 30 जनवरी को कही। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता न्याय को प्रचार में, नीति को हथियार में और शिक्षा को नियंत्रण के औज़ार में बदलने का प्रयास करती है, तब-तब लोकतंत्र की आत्मा विद्रोह करती है। यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स 2026 पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, यह संविधान की चेतावनी, लोकतंत्र की हुंकार और सत्ता के अहंकार पर ऐतिहासिक प्रहार है।

नायक ने कहा कि यह केवल एक नीति का विवाद नहीं, यह भारत के वैचारिक भविष्य की लड़ाई है। कहा कि जिस नीति को बीजेपी सरकार ने ऐतिहासिक क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया, वह अब संवैधानिक कसौटी, सार्वजनिक आलोचना और नैतिक विवेचना के कठघरे में खड़ी है। यह विवाद किसी एक नियम तक सीमित नहीं रहा। यह समकालीन शासन-मानसिकता का दर्पण बन चुका है।

सामाजिक न्याय भाजपा के लिए नीति नहीं, रणनीति

नायक ने कहा कि सामाजिक न्याय कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व और सामाजिक उत्तरदायित्व है। दुर्भाग्यवश, बीजेपी सरकार ने इसे चुनावी रणनीति और जनभावना प्रबंधन के उपकरण में बदल दिया है। कहा कि जब सामाजिक न्याय सत्ता की रणनीति बन जाए। सामाजिक न्याय कोई दया नहीं, वह संविधान का वचन, इतिहास का ऋण और भविष्य की अनिवार्यता है। परंतु बीजेपी सरकार ने इसे राजनीतिक मुद्रा, भावनात्मक व्यापार और चुनावी हथियार में बदल दिया है। यह नीति वंचित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए नहीं, उनके नाम के दोहन के लिए लाई गई है। उन्होंने कहा कि समानता स्थापित करने के लिए नहीं, समाज को विभाजित करने के लिए गढ़ी गई। शिक्षा सुधार के लिए नहीं, सत्ता के प्रचार-तंत्र को मजबूत करने के लिए थोप दी गई। यह नीति नहीं सत्ता का छल, रणनीति का षड्यंत्र और सामाजिक न्याय का अपमान है।

विश्वविद्यालय: ज्ञान के तीर्थ या सत्ता की प्रयोगशाला?

नायक ने कहा कि प्राचीन भारत में तक्षशिला और नालंदा सत्ता से स्वतंत्र ज्ञान के दीप स्तंभ थे। आज बीजेपी के शासन में विश्वविद्यालयों को वैचारिक अनुशासन शिविर, राजनीतिक प्रयोगशाला और प्रचार-कारखाना बनाने का प्रयास हो रहा है। जहाँ कभी विचार जन्म लेते थे, आज वहाँ डर, निगरानी और वैचारिक दमन थोपा जा रहा है। यह शिक्षा का विस्तार नहीं, यह बौद्धिक स्वतंत्रता का हनन और ज्ञान की आत्मा का दमन है। उन्होंने कहा कि एक कृत्रिम युद्ध बीजेपी ने जानबूझकर मेरिट बनाम सामाजिक न्याय का झूठा संघर्ष खड़ा किया,
मानो उत्कृष्टता और समानता एक-दूसरे के शत्रु हों। सत्य यह है कि वास्तविक मेरिट वहीं फलती है, जहाँ अवसर समान हों। कहा कि यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक यह संदेश है कि संविधान सत्ता के अधीन नहीं, सत्ता संविधान के अधीन है। सामाजिक न्याय प्रचार से नहीं, संवैधानिक विवेक से संचालित होगा। शिक्षा राजनीतिक प्रयोग नहीं, राष्ट्रीय उत्तरदायित्व है। यह केवल न्यायिक हस्तक्षेप नहीं, यह सत्ता के अतिरेक पर लोकतंत्र की विजय है।

बीजेपी की नीति नहीं सत्ता की मानसिकता बेनकाब यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स अब बीजेपी की शासन-शैली का ऐतिहासिक प्रमाण बन चुके हैं जहाँ प्रचार, नीति से बड़ा है। राजनीतिक लाभ, जनहित से ऊपर है। जहाँ विचारों के स्थान पर नैरेटिव गढ़े जाते हैं और जहाँ शिक्षा को नियंत्रण का उपकरण समझा जाता है। यह सुधार नहीं यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर सत्ता का आक्रमण है। स्पष्ट है कि शिक्षा भाजपा की राजनीति की बंधक नहीं बनेगी, सामाजिक न्याय को नारे से निकालकर वास्तविक अधिकार बनाया जाएगा।विश्वविद्यालयों को फिर से ज्ञान के मुक्त केंद्र बनाया जाएगा और संविधान की सर्वोच्चता की हर मंच पर रक्षा की जाएगी। यह केवल नीति-विरोध नहीं, यह लोकतंत्र, विवेक और भारत के भविष्य की रक्षा का संघर्ष है।

एसपी सक्सेना-30/1/26.

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