रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। झारखंड के आदिवासी समुदाय में प्रकृति पर्व सरहुल को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। चार दिनों तक चलने वाले इस पारंपरिक पर्व में उपवास, जल रखाई, वर्षा की भविष्यवाणी, मछली और केकड़ा पकड़ने जैसी रस्में निभाई गईं।
सरहुल पूजा के बाद एक अप्रैल को भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में आदिवासी पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। शहर के विभिन्न सरना स्थलों पर विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की गई। मान्यता के अनुसार, महाप्रलय के दौरान धर्मेश और सरना मां ने दो इंसानों को केकड़े के बिल में छुपाया था, जिससे सृष्टि का पुनर्जन्म हुआ। इसी परंपरा के तहत केकड़ा पकड़ने की रस्म निभाई जाती है। इस क्रम में दोपहर 2 बजे से शहर में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ शोभायात्रा निकाली गई।
शोभायात्रा सेक्टर 9 बसंती मोड़ से होते हुए सिटी सेंटर, बिरसा चौक और नया मोड़ तक पहुंची, जहां बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। प्रशासन ने यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम किए थे और विभिन्न स्थानों पर पुलिस बल तैनात किया गया था।
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