गंगोत्री प्रसाद सिंह/हाजीपुर (वैशाली)। वैशाली जिला के हद में देसरी प्रखंड के देसरी ग्राम स्थित घाघरा नदी तट पर स्थित विषहरी माता मंदिर परिसर में 9 अगस्त को तीन दिवसीय नाग पंचमी मेला की शुरुआत की गयी। मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालू महिला, पुरुष व् बच्चे उपस्थित थे।
बताया जाता है कि नाग पंचमी के अवसर पर वैशाली जिले के अलावे आसपास के समस्तीपुर, दरभंगा, पटना और सारण जिले के हजारों दर्शनार्थी मेले में पहुंचकर विषहरी देवी और नाग देवता का पूजन कर दूध-लावा अर्पित किया।
ऐसी मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन यहां पूजा करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सर्पदंश के प्रभाव से भी उसे मुक्ति मिल जाती है। उक्त मेला के आयोजन के संबंध में प्रचलित कथानुसार यहां के दो दोस्त झींगुर पंडित और चम्मन बैठा रोजी-रोटी की तलाश में तिरहुत गए थे।
तिरहुत जाने के क्रम में दोनों दोस्त ने कमला नदी के तट पर रात्रि में विश्राम किया। रात्रि में सोने के वक्त झींगुर पंडित को सांप के रूप में विषहरी देवी ने दर्शन देकर कहा कि तुम मुझे यहां से दक्षिण दिशा की ओर ले चलो, जहां कोई नदी या सरोवर स्थापित हो।
तुम अपनी गगरी में कमला नदी का जल भर लो। दूसरे दिन प्रात: जब झींगुर पंडित की आंख खुली तो उसने रात में देखे सपने की बात अपने साथी चम्मन बैठा को बताई। फिर उसी वक्त झींगुर पंडित और चम्मन बैठा ने गगरी में कमला नदी का जल भरा और विषहरी देवी का मनन कर बुलाया।
इसके बाद सांप के रूप में प्रकट हुई विषहरी देवी फूल बनकर उसकी जल से भरी गगरी में बैठ गई। गगरी को दोनों यहां ले आए। यहां लाने के बाद स्थानीय घाघरा नहर के किनारे दोनों ने एक मिट्टी का पिण्ड बनाया। उस पर फूल को रखते ही सांप के रूप में विषहरी देवी प्रगट हो गई और दोनों को आर्शीवाद देने के बाद उसी पिण्ड में स्थापित हो गई।
पौराणिक कथा के अनुसार विषहरी देवी को इस जगह पर लाए जाने का महीना सावन था। जिस दिन उनको इस पिण्ड में स्थापित कराया गया वह तिथि नाग पंचमी थी। इसके बाद इस बात की जानकारी जब स्थानीय रहिवासियों को हुई तब रहिवासियों ने विषहरी देवी पिण्ड पर दूध-लावा चढ़ाना शुरू किया।
बाद में आस पास तथा दूर दराज से श्रद्धालू नाग पंचमी को दूध और धान का लावा चढ़ाने आने लगे। इस परंपरा ने आज यहां मेले का रूप ले लिया। तब से प्रत्येक वर्ष की नाग पंचमी के दिन इस स्थल पर विषहरी मेला लग रहा है, जो तीन दिनों तक चलता है।
आज झींगुर पंडित और चम्मन बैठा भले ही जीवित न हों, लेकिन आज भी यह परंपरा बनी हुई है कि उन्हीं के परिवार के सदस्य सबसे पहले विषहरी देवी को दूध-लावा अर्पित करते हैं। इसके बाद से ही अन्य स्थानीय व् दूर-दराज से आए श्रद्धालूगण विषहरी देवी प्रतिमा के समीप दूध-लावा चढ़ाते हैं।
151 total views, 1 views today