एन. के. सिंह/फुसरो (बोकारो)। सूर्य के मकर राशि संक्रमण काल यानी उत्तरायण होने के समय में परिवर्तन होने के कारण हिन्दू मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता रहा है। यह पर्व अबतक 14 जनवरी को मनाया जाता रहा है।
इस बार मकर संक्रांति पर्व 14 जनवरी के बजाय 15 जनवरी को मनाया जायेगा। बावजूद इसके पूर्व परंपरा के अनुसार ही 14 जनवरी को बोकारो जिला के हद में पेटरवार तथा बेरमो प्रखंड के सीमांकन पर स्थित हिंदुस्तान पुल फुसरो के समीप दामोदर नदी तट पर हथिया पत्थर भव्य मेले का आयोजन किया गया।
हथिया पत्थर मेला में स्थानीय सहित दूरदराज के ग्रामीण रहिवासियों की काफी संख्या में भीड़ उमड़ी। मेला में श्रद्धालुओं ने जमकर खरीददारी की।
हथिया पत्थर मेला के अवसर पर 14 जनवरी की सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालू दामोदर नदी में स्नान कर हथिया पत्थर (शिला रूपी पत्थर) की पूजा पाठ करने में जुटे रहे। इस मेले में हजारों की संख्या में भीड़ लगी रही। उक्त मेले में भीड़ इस कदर रही कि सड़क पर वाहन भी धीमी गति से चलाना पड़ा। यहां समिति की चुस्त व्यवस्था व संचालन सहित स्थानीय पुलिस भी चौकस रही।
भीड़ को नियंत्रित करने को लेकर जगह जगह पुलिस की तैनाती की गई। मेला तथा उसके आसपास बेरमो व पेटरवार पुलिस के जवान तैनात थे। वही फुसरो जैनामोड़ मुख्य मार्ग के दामोदर नदी हिंदुस्तान पूल में घंटो ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी रही। दोनों ओर लगभग डेढ़ किलोमीटर तक लंबी वाहनों का कतार लग गया।
बताते चलें कि, आस्था का प्रतीक हथिया पत्थर मेला यहां प्रत्येक वर्ष लगता है। यहां मेले में आये श्रद्धालु स्नान कर स्थानीय देवी मंदिर में पूजा-अर्चना भी करते है, ताकि उनकी मनोकामना पूर्ण हों। साथ ही हथिया पत्थर में भी श्रद्धालू प्रसाद लेकर तथा धूप-अगरबत्ती दिखाकर पूजा कर मनोकामना पूरी होने की मन्नतें मांगते हैं। कहा जाता है कि सच्चे दिल से मांगी गयी मन्नत यहां जरूर पूरी होती है।
इस मेले में चाट, खिलौना, खोमचे, कैलेन्डर आदि की कई दुकानें लगी थीं। लोगों ने पूजा पाठ करने के साथ ही यहां मेले का भी लुत्फ उठाया। मेले में पुरुषों सहित बच्चों व महिलाओं की भारी संख्या में भीड़ जुटी। महिलाओं की भीड़ चाट, छोले-भटूरे, गोलगप्पे आदि के खोमचे के इर्द-गिर्द जहां जुटी रही, आदि।
वहीं बच्चों के आकर्षण का केंद्र रहा रंग बिरंगे खिलौने की दुकानें। साथ ही हथिया पत्थर का दर्शन भी श्रद्धालू कौतूहल व श्रद्धा से कर रहे थे। इस मौके पर हथिया पत्थर को रंगीन कपड़े से ढंककर उसकी पूजा भी की गई। साथ ही मन्नत अनुसार किसी ने मुर्गे की बलि चढ़ाई तो किसी ने पाठा की।
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