एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड में मनाया जानेवाला सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह जीवन जीने की एक शैली है। प्रकृति का सम्मान करो, उसे बचाओ और उसके साथ मिलकर जीवन जीओ। यही हमारे अस्तित्व की कुंजी है।
वरिष्ट कांग्रेसी विजय शंकर नायक के अनुसार झारखंड की धरती पर जब साल वृक्षों की डालियों पर नई कोपलें फूटती हैं, जब जंगलों में हरियाली का नवजीवन उमड़ता है, तब आदिवासी समाज पूरे उल्लास के साथ सरहुल पर्व का स्वागत करता है। सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह प्रकृति और मानव के बीच गहरे रिश्ते का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन का वास्तविक आधार प्रकृति है और उसकी रक्षा करना ही हमारे अस्तित्व की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि सरहुल शब्द दो भागों से मिलकर बना है। सर अर्थात साल वृक्ष और हुल अर्थात पूजा या उत्सव। यानी यह साल वृक्ष की पूजा का पर्व है। झारखंड के आदिवासी समुदाय, विशेषकर उरांव, मुंडा और हो जनजाति, इस पर्व को अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं। सरहुल प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का अवसर है, जिसमें धरती माता, जंगल, जल, हवा और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।
नायक के अनुसार यह पर्व इस बात का भी प्रतीक है कि मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहना चाहिए। जब हम प्रकृति के साथ तालमेल बिठाते हैं, तभी जीवन सुखमय और समृद्ध बनता है। कहा कि सरहुल का पर्व आदिवासी समाज के धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दिन पाहन (गांव का पुजारी) गांव के सरना स्थल पर जाकर पूजा करते है। सरना स्थल वह पवित्र स्थान होता है, जहां साल वृक्षों के बीच देवताओं का वास माना जाता है।
इस अवसर पर पाहन भगवान से अच्छी फसल, वर्षा, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना करता है। पूजा के दौरान मुर्गा, हंडिया (चावल से बनी पारंपरिक पेय) और अन्य पारंपरिक वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं। इसके बाद पूरे गांव में प्रसाद वितरित किया जाता है। यह पूजा केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह समाज की एकता और सामूहिकता का प्रतीक भी है। सभी एक साथ मिलकर पूजा करते हैं, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।
नायक ने बताया कि सरहुल हमें यह सिखाता है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी जीवनदायिनी शक्ति है। आज के आधुनिक युग में जहां आमजन प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं, वहीं सरहुल जैसे पर्व हमें चेतावनी देते हैं कि यदि हमने प्रकृति का सम्मान नहीं किया, तो इसका परिणाम विनाशकारी होगा। कहा कि साल वृक्ष को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह झारखंड के जंगलों का प्रमुख वृक्ष है। इसके फूलों को पवित्र माना जाता है और इन्हें घरों में सजाया जाता है। यह प्रकृति के नवजीवन और पुनर्जन्म का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि सरहुल केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मेल-जोल का भी पर्व है। इस दिन आदिवासी समाज के महिला, पुरुष व् बच्चे नए कपड़े पहनते हैं। खुशी से नाच-गान करते हैं और एक-दूसरे के घर जाकर बधाई देते हैं।
कहा कि इस विशेष अवसर पर गांवों में अखाड़ा सजाया जाता है, जहां पारंपरिक नृत्य और गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। महिलाएं और पुरुष मिलकर झूमर और डोमकच जैसे लोकनृत्य करते हैं। मांदर और नगाड़े की धुन पर पूरा वातावरण उत्सवमय हो जाता है।
नायक के अनुसार यह पर्व जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को समाप्त कर सभी को एक मंच पर लाता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब सरहुल का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि यदि हम प्रकृति को बचाएंगे, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा। कहा कि आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीता रहा है। उन्होंने कभी भी प्रकृति का शोषण नहीं किया, बल्कि उसे पूजनीय माना। यही कारण है कि उनके जीवन में पर्यावरणीय संतुलन बना रहा।
नायक के अनुसार सरहुल के माध्यम से हमें यह सीखने की जरूरत है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में, जब हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं, सरहुल जैसे पर्व हमें हमारी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ते हैं। यह हमें हमारी पहचान का अहसास कराते हैं। शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण कई परंपराएं धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं, लेकिन सरहुल आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी समाज अपनी संस्कृति को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमें भी इस परंपरा को समझने और सम्मान देने की आवश्यकता है। यह केवल एक समुदाय का त्योहार नहीं, बल्कि यह पूरे मानव समाज के लिए एक प्रेरणा है।
सरहुल पर्व में महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए नायक ने कहा कि सरहुल पर्व में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे इस पर्व की तैयारियों में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। घर की साफ-सफाई, भोजन की व्यवस्था और पारंपरिक परिधानों की तैयारी में उनका योगदान अहम होता है। इस अवसर पर नृत्य और गीतों में भी महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। उनके बिना यह उत्सव अधूरा लगता है। यह पर्व महिलाओं के सम्मान और उनकी भागीदारी का भी प्रतीक है।
उन्होंने बताया कि सरहुल का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस दौरान बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। पारंपरिक वस्त्र, आभूषण और खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ जाती है। इसके साथ ही यह पर्व पर्यटन को भी बढ़ावा देता है। बाहर से आने वाले सैलानी इस उत्सव को देखने के लिए झारखंड आते हैं, जिससे राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलती है।
उन्होंने कहा कि सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह जीवन जीने की एक शैली है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही हम सच्चे अर्थों में खुशहाल जीवन जी सकते हैं। कहा कि आज जब दुनिया विकास की अंधी दौड़ में लगी है, ऐसे में सरहुल हमें रुककर सोचने का मौका देता है कि क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण छोड़ पाएंगे?
नायक के अनुसार सरहुल का संदेश स्पष्ट है कि प्रकृति का सम्मान करो, उसे बचाओ और उसके साथ मिलकर जीवन जीओ। यही हमारे अस्तित्व की कुंजी है। सरहुल हमें यह सिखाता है कि सच्ची समृद्धि केवल भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित और सामंजस्यपूर्ण जीवन में है। यह पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और हमें एक बेहतर भविष्य की ओर प्रेरित करता है।
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