इस बार सिंहवाहिनी शक्ति स्वरूपा भगवती दुर्गा का हाथी पर आगमन

शारदीय नवरात्र का पूजन आज से आरंभ, कलश स्थापन संपन्न

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। शारदीय नवरात्र के प्रथम दिवस 15 अक्टूबर को सारण जिला के हद में हरिहर क्षेत्र सोनपुर के शक्ति मंदिरों में पूजा ग्रहण करने और भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए सिंह वाहिनी शक्ति स्वरूपा भगवती दुर्गा का हाथी पर आगमन हुआ। यहां देवी के जयघोष से सम्पूर्ण वातावरण गूंज उठा।

जानकारी के अनुसार शारदीय नवरात्रा के प्रथम दिवस सोनपुर स्थित श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम दिव्य देश (नौलखा मंदिर) में भी कलश स्थापना किया गया। कलश स्थापना दिवस पर उपस्थित भक्तों को संबोधित करते हुए दिव्य देश पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के अलग-अलग नौ शक्ति स्वरूपों की पूजा की जाती है।

साल में चार बार पौष, चैत्र, आषाढ़ और अश्विन महीने में नवरात्र आते हैं। उन्होंने बताया कि चैत्र और आश्विन में आने वाले नवरात्र प्रमुख होते हैं, जबकि अन्य दो महीने पौष और आषाढ़ में आने वाले नवरात्र गुप्त नवरात्रि के रूप में मनाए जाते हैं। वहीं आश्विन महीने से शरद ऋतु की शुरुआत होने लगती है, इसलिए आश्विन महीने के नवरात्र को शारदीय नवरात्र के नाम से जाना जाता है।

ये नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र 15 अक्टूबर से शुरू हो कर 23 अक्टूबर तक चलेंगे। स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि नवरात्रि के पहले दिन देवी मां के निमित्त कलश स्थापना की जाती है। उन्होंने भक्तों को आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा चित्रा नक्षत्र में अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना की सलाह दी, क्योंकि नित ही सूर्य जब अपने चरम पर होता है तो सभी कुछ अस्त हो जाता है।

कहा कि सूर्य के आगे सभी कुछ प्रभावहीन हो जाता है। मध्याह्न के इस मुहूर्त को अभिजित मुहूर्त कहते हैं। अभिजीत मुहूर्त दोपहर पहले 11 बजकर 22 मिनट से दोपहर 12 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। इस प्रकार जगद्गुरु स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कलश स्थापना पूरी विधि विधान से कर पाठ प्रारंभ किया। उन्होंने श्रीमद् वाल्मीकि रामायण के नवाह पारायण का भी पाठारम्भ किया।

इस अवसर पर मन्दिर के प्रबंधक नन्द कुमार बाबा भी उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि पवित्र नारायणी नदी के जल में वरूण देवता का आवाहन कर कलश के मुख पर कलावा बांधकर और एक मिट्टी की कटोरी से कलश को ढककर चावल भर, एक जटा वाला नारियल लेकर उसे लाल कपड़े में लपेटकर, ऊपर कलावे से बांधकर चावल से भरी हुई कटोरी के ऊपर स्थापित किया गया।

उन्होंने कहा कि कुछ श्रद्धालु कलश के ऊपर रखी गई कटोरी में ही घी का दीपक जला लेते हैं। ऐसा करना उचित नहीं है। कलश के ऊपर दीपक नहीं जलाना चाहिए। दूसरी बात ये है कि कुछ श्रद्धालु कलश के ऊपर रखी कटोरी में चावल भरकर उसके ऊपर शंख स्थापित करते हैं। इसमें कोई परेशानी नहीं है। आप ऐसा कर सकते हैं। बशर्ते कि शंख दक्षिणावर्त होना चाहिए।

शंख का मुंह ऊपर की ओर और चोंच अपनी ओर करके रखें। इस सारी कार्यविधि में एक चीज का विशेष ध्यान रखें कि ये सब करते समय नवार्ण मंत्र अवश्य पढ़ें। नवार्ण मंत्र है- ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे। मन्दिर प्रबंधन द्वारा बताया गया कि इस बार महानवमी, विजयादशमी दोनों 23 अक्टूबर को हीं है।

मन्दिर प्रबंधक नन्द बाबा ने बताया कि श्रवण नक्षत्र और दशमी तिथि का योग में ही विजय यात्रा, दुर्गा विसर्जन, सीमोलघंनम्, नीलकंठ दर्शन, शमी पूजन, जयंती ग्रहणम् एवं विजयादशमी पर्व मनाया जाता है।

वहीं ज्योतिषाचार्य नन्द किशोर तिवारी ने बताया कि अपराह्नव्यापिनि श्रवणयोगवती इयमेव विजयादशमी। सा च द्वितीय दिने श्रवण योगाभावे पूर्वा ग्राह्या। अतः 23 अक्टूबर को हीं विजयादशमी है। पारणा के लिए दशमी तिथि का विधान है जो सोमवार शाम से मंगलवार साढ़े बारह बजे तक है।

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