श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन कृष्ण- सुदामा महामिलन की प्रस्तुति
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित बाबा हरिहरनाथ मन्दिर परिसर में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिवस 25 अगस्त को श्रद्धालुओं ने वृन्दावन की फूलों की प्रसिद्ध होली का आनंद लिया। दर्शकों ने अपने हाथों में पुष्प लेकर राधा -कृष्ण और व्यासपीठ पर पुष्प वर्षा की।
आज के प्रवचन के दौरान सुदामा और द्वारकाधीश श्रीकृष्ण के मिलन प्रसंग को सुनकर भक्तों की आंखों में आंसू छलक आए। मित्रता की ऐसी मिसाल अन्यत्र और कहीं देखने -सुनने को नहीं मिलती। वृंदावन से पधारे कथा वाचक आचार्य सुमंत कृष्ण शास्त्री कन्हैयाजी महाराज ने कथा श्रवण के क्रम में 25 अगस्त को कहा कि ब्राह्मण सुदामा की धर्मपत्नी सुशीला अपनी गरीबी और फटेहाल से परेशान होकर सुदामाजी को द्वारका जाने के लिए प्रेरित करती हुईं कहती हैं कि आपके मित्र श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश है, आप वहां जाइये।

वे हमारी दरिद्रता अवश्य दूर करेंगे, परंतु सुदामाजी किंकर्तव्यविमूढ़ बने रहे। तरह-तरह के विचारों को अपने हृदय में बसाने लगे। अंत में सुशीला के बार-बार आग्रह पर द्वारका जाने के लिए सुदामाजी तैयार हो गये। उन्होंने अपनी धोती की पोटली में और कुछ नहीं प्रेम रुपी प्रसाद के रूप में थोड़ा चावल बांध द्वारका के लिए प्रस्थान किया। द्वारका महल के मुख्य द्वार पर द्वारपालों ने उन्हें अंदर प्रवेश से रोक दिया।
भक्त सुदामा ने अंत में द्वारपालों से आग्रह करते हुए कहा कि द्वारिकाधीश से कह दो कि आपका मित्र सुदामा आपसे भेंट करने आया है।
द्वारिकाधीश ने जब उनकी आवाज सुनी तो वे दौड़े हुए आए और अपने मित्र सुदामा को गले से लगा लिया। ऐसे कारुणिक वर्णन को सुनकर दर्शकों की आंखों में अश्रु आ गए। प्रवचन कर्ता ने कहा कि मित्रता यह कि द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को अपने आसन पर बैठाया। उनके पांव पखारे और अपने लिए लाए गए सौगात पोटली में रखे चावल को जबरदस्ती छीन कर खाने लगे।
अभी दो बार ही खाया था कि रुक्मिणीजी ने उन्हें रोक दिया। सुदामाजी के इस एक सौगात और चावल के दाने को खाकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मित्र के लिए कुटिया की जगह सोने का महल बना दिया। ऐसा अद्भुत उदाहरण और कहीं सुनने या देखने को नहीं मिलता।
![]()













Leave a Reply