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बोकारो में भगवान परशुराम के जीवन गाथा पर आधारित स्मारिका का विमोचन

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। भगवान परशुराम के जीवन पर आधारित स्मारिका का विमोचन समारोह बोकारो के जायका रेस्टोरेंट सभागार में श्रद्धा एवं भव्यता के साथ एक जुलाई को आयोजित किया गया। इस स्मारिका का प्रकाशन संपूर्ण विश्व शांति सेवा परिषद के तत्वावधान में किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य भगवान परशुराम के जीवन व आदर्शों को समाज के समक्ष प्रस्तुत कर जनमानस को प्रेरित करना तथा सनातन संस्कृति को व्यापक रूप से प्रचारित-प्रसारित करना है।

स्मारिका विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं सिवान लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद ओमप्रकाश यादव उपस्थित रहे। उन्होंने स्मारिका का विधिवत विमोचन करते हुए कहा कि भगवान परशुराम केवल एक युगपुरुष नहीं, बल्कि न्याय, शौर्य, तप और समर्पण के प्रतीक हैं। उन्होंने समाज में व्याप्त अन्याय और अधर्म के विरुद्ध शस्त्र उठाकर धर्म की रक्षा की, जो आज के युग में भी प्रासंगिक है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में बोकारो स्टील प्लांट के आरएफओ ए. के. तिवारी, बोकारो स्टील के अवकाश प्राप्त महाप्रबंधक बी. पी. उपाध्याय तथा इस्टेट कोर्ट के सेवानिवृत्त अधिकारी विनोद कुमार मिश्रा ने भी मंच साझा किया। अतिथियों का स्वागत मीडिया प्रभारी विनय कुमार तिवारी ने किया। सभी अतिथियों ने भगवान परशुराम के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला और कहा कि नई पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर नैतिक मूल्यों को अपनाना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं संचालन विहंगम योग संत समाज के अंतरराष्ट्रीय प्रचारक सह विहंगम योग संदेश पत्रिका के प्रधान संपादक सुखनंदन सिंह सदय ने किया। वहीं धन्यवाद ज्ञापन सम्पूर्ण विश्व शांति सेवा परिषद के केंद्रीय महामंत्री डॉ अशोक कुमार पांडेय द्वारा किया गया।

आयोजन को सफल बनाने में परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र दुबे, प्रदेश अध्यक्ष हरेराम पांडेय, मीडिया प्रभारी विनय कुमार तिवारी, जिलाध्यक्ष श्यामल झा, संगठन मंत्री संतोष मिश्रा, दिनेश चौबे, उमेश चंद्र द्विवेदी, सी एस दुबे, अन्नू मिश्रा, अधिवक्ता लड्डू दुबे सहित परिषद के कई पदाधिकारियों और समाजसेवियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्मारिका में भगवान परशुराम के जन्म, शिक्षा, शस्त्र विद्या, सामाजिक दायित्वों, धर्म की रक्षा में उनके योगदान और महर्षियों व देवों के प्रति उनकी श्रद्धा का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह स्मारिका न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान दस्तावेज है। समारोह के अंत में अतिथियों को सम्मानित किया गया और सभी प्रतिभागियों ने भगवान परशुराम की जयन्ती को सामाजिक एकता एवं संस्कृतिक चेतना का माध्यम बनाने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम में सैकड़ों श्रद्धालु, बुद्धिजीवी एवं समाजसेवी उपस्थित रहे, जिनकी उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया। इस आयोजन ने स्पष्ट किया कि भगवान परशुराम की शिक्षा आज भी समाज में प्रासंगिक हैं और उनका जीवन हमें धर्म, न्याय और पराक्रम के पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।

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