एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता विजय शंकर नायक के अनुसार झारखंड की इस पावन धरती पर खनिजों की अनमोल चमक है। यहां कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम प्रचुर मात्रा में है। बावजूद इसके इसी माटी में सदियों से शोषण, विस्थापन और अधिकार-वंचना का खून बहता रहा है।
नायक के अनुसार वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की लगभग 26.21 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति और लगभग 12 प्रतिशत अनुसूचित जाति से है। यानी हर तीन में से एक झारखंडवासी उस समुदाय से है जिसे इतिहास ने विकास की दौड़ में सबसे पीछे धकेल दिया है। आज जब राज्य का वार्षिक बजट लाखों करोड़ की योजनाओं का खाका खींचता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बजट की पहली पंक्ति में वे शामिल हैं जो सदियों से अंतिम पायदान पर खड़े रहे हैं? झारखंड देश के खनिज उत्पादन में अग्रणी है, लेकिन मानव विकास सूचकांक में देश के पिछड़े राज्यों में शुमार है। यह विडंबना तभी खत्म होगी जब बजट की प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य होगी।
लाभ नहीं अधिकार होगा और विकास का मतलब विस्थापन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण होगा। यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-अधिकार, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित, डेटा-आधारित, पारदर्शी और समुदाय-संचालित बजट बने, तो झारखंड न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत बनेगा, बल्कि पूरे देश के लिए सामाजिक न्याय का जीवंत मॉडल भी बनेगा।
नायक के अनुसार ऐसा बजट ही दलित-आदिवासी-मूलवासी एवं अन्य कमजोर वर्गों के अंतिम पायदान पर बैठे नागरिकों तथा उच्च जाति के सबसे गरीब परिवारों के सर्वांगिण, चहुमुखी और समग्र विकास का वास्तविक मार्ग प्रशस्त करेगा। एक कठोर सच यह कि झारखंड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में अग्रणी है, लेकिन जिन जिलों से ये खनिज निकलते हैं यथा पश्चिम सिंहभूम, गुमला, पाकुड़, लातेहार। वहीं गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और पलायन की दर यहां सबसे ऊँची है। विकास की गाड़ी तेज़ चली, लेकिन अंतिम डिब्बा छूट गया। यह विरोधाभास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक संकट है। अब समय आ गया है कि बजट इस नैतिक संकट का समाधान बने।
शिक्षा: अधिकार, दान नहीं आदिवासी-दलित बहुल क्षेत्रों में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 25 से 35 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। बालिका शिक्षा की स्थिति और भी दर्दनाक है। यदि बजट में शिक्षा पर 30 प्रतिशत से कम आवंटन होता है, तो यह सामाजिक न्याय की अधूरी प्रतिबद्धता होगी। बजट में हर आदिवासी प्रखंड में आवासीय विद्यालय अनिवार्य हो। प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा संथाली, मुंडारी, हो, कुरुख में हो, ताकि बच्चों में सीखने की क्षमता बढ़े और सांस्कृतिक पहचान बरकरार रहे। उच्च शिक्षा में दलित-आदिवासी विद्यार्थियों के लिए शत प्रतिशत छात्रवृत्ति, कोचिंग सहायता और तकनीकी संस्थानों में आरक्षित सीटों का सख्त क्रियान्वयन हो।
दलित-आदिवासी कौशल मिशन के तहत ₹1000-2000 करोड़ का वार्षिक प्रावधान कर आईटीआई, पॉलिटेक्निक और स्किल सेंटरों को उद्योगों से जोड़ा जाए, ताकि प्रशिक्षण के साथ रोजगार भी सुनिश्चित हो। शिक्षा केवल साक्षरता नहीं, यह सामाजिक गतिशीलता का सबसे मजबूत पुल है। यही वह सीढ़ी है जिस पर चढ़कर अंतिम पायदान का बच्चा भी शिखर छू सकता है।
भूमि और वनाधिकार सम्मान का प्रश्न सदियों से जंगल-जमीन से जुड़ा समाज आज भी अपने ही संसाधनों पर अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है। वनाधिकार कानून के तहत हजारों दावे अभी भी लंबित है। जब तक सामुदायिक और व्यक्तिगत पट्टे नहीं बाँटे जाते, विकास अधूरा रहेगा। बजट में वनाधिकार मिशन फंड के तहत कम से कम ₹500 करोड़ का विशेष प्रावधान हो। लघु वनोपज यथा तसर, महुआ, साल बीज, लाख के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और स्थानीय प्रोसेसिंग इकाइयाँ स्थापित हों। खनिज रॉयल्टी और डीएमएफ फंड का कम से कम 40 प्रतिशत स्थानीय समुदायों के विकास पर खर्च हो। सिंचाई, सौर पंप, सूक्ष्म जलाशयों में निवेश बढ़े। महिला स्वयं सहायता समूहों को बिना ब्याज ऋण और विपणन सहायता दी जाए। विकास का मॉडल विस्थापन का नहीं, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय समुदाय के अधिकार का हो। तभी न्यायपूर्ण विकास संभव होगा।
स्वास्थ्य: जीवन का अधिकार दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएँ आज भी नाम मात्र है। मातृ मृत्यु दर और कुपोषण गंभीर समस्या बना है। स्वास्थ्य बजट में 25 प्रतिशत वृद्धि हो। हर 20,000 आबादी पर एक पूर्ण सुसज्जित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) बने, जिसमें विशेषज्ञ डॉक्टर, दवाइयाँ और एम्बुलेंस अनिवार्य हों। पोषण सुरक्षा मिशन के लिए ₹1000 करोड़ का वार्षिक प्रावधान हो। मोबाइल मेडिकल यूनिट, मातृ-शिशु स्वास्थ्य मिशन और मानसिक स्वास्थ्य व नशा मुक्ति केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित हों। स्वास्थ्य कोई दया नहीं, संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन का अधिकार है। बजट में यह भावना साफ झलकनी चाहिए।
रोजगार और पलायन: मजबूरी नहीं, विकल्प झारखंड से लाखों युवा रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं। यह सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक विखंडन की त्रासदी है। दलित-आदिवासी उद्यमिता कोष के लिए ₹2000 करोड़ का प्रावधान हो। खनिज आधारित उद्योगों में 75 प्रतिशत स्थानीय रोजगार अनिवार्य किया जाए। मनरेगा को जल संरक्षण और उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़ा जाए। हस्तशिल्प, बांस, तसर और कृषि आधारित लघु उद्योगों के लिए विशेष स्टार्टअप कोष बने। रोजगार ऐसा हो जो पलायन रोके, आत्मसम्मान बढ़ाए और युवाओं को अपनी मिट्टी से जोड़े।
सामाजिक न्याय और सुरक्षाअनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून के बावजूद न्याय प्रक्रिया लंबी और जटिल है। कानूनी सहायता और फास्ट-ट्रैक अदालतों के लिए विशेष कोष हो। वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन में 50 प्रतिशत वृद्धि हो। सभी छात्रवृत्ति और सामाजिक योजनाओं का 100 प्रतिशत समयबद्ध डिबिटी सुनिश्चित हो। न्याय कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर दिखना चाहिए। आवास, सड़क और बुनियादी ढाँचा सुरक्षित पक्का घर, स्वच्छ पेयजल, बिजली, सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी सुविधा नहीं, गरिमापूर्ण जीवन के अनिवार्य तत्व हैं।
आदिवासी-दलित बस्तियों में पक्के घरों का निर्माण, हर घर जल योजना का पूर्ण विस्तार, हर टोला को सड़क से जोड़ना और ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी बजट की प्राथमिकता बने। पारदर्शिता और जन भागीदारी बजट बनाना पर्याप्त नहीं, उसका सही उपयोग ज़रूरी है। इसलिए ग्राम सभा आधारित पार्टिसिपेटरी बजटिंग लागू हो। सभी योजनाओं की ऑनलाइन ट्रैकिंग, वार्षिक सामाजिक लेखा परीक्षा और जिला स्तर पर स्वतंत्र प्रभाव मूल्यांकन अनिवार्य हों।
नायक के अनुसार बजट एक नैतिक दस्तावेज़ है। राज्य का बजट मात्र आय-व्यय का ब्यौरा नहीं, यह तय करता है कि राज्य किसके साथ खड़ा है। यदि अंतिम पायदान पर खड़े दलित, आदिवासी, मूलवासी और गरीब समाज को केंद्र में रखकर बजट नहीं बना, तो विकास की चमक सिर्फ शहरों तक सिमट जाएगी। आज ज़रूरत है ऐसे बजट की जहाँ प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य हो। लाभ नहीं, अधिकार हो।
विकास का अर्थ विस्थापन नहीं, सशक्तिकरण हो। तभी झारखंड की आत्मा पूरी होगी। तभी बजट ऐतिहासिक कहलाएगा। दलित, आदिवासी और मूलवासी समाज के बिना झारखंड अधूरा है। बजट की हर पंक्ति में यह संदेश साफ दिखे कि राज्य की प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य है। मुनाफा नहीं, गरिमा है और विकास विस्थापन नहीं, सशक्तिकरण है। ऐसा बजट ही झारखंड को न सिर्फ आर्थिक रूप से समृद्ध, बल्कि सामाजिक न्याय का राष्ट्रीय मॉडल बनाएगा।
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