Advertisement

जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती समारोह संपन्न

देश की एकता, अखंडता व् स्वाभिमान के लिए आजीवन संघर्षरत रहे डॉ मुखर्जी-उपेन्द्र

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में रजिस्ट्री बाजार सोनपुर स्थित भाजपा कार्यालय में 6 जुलाई को देश की एकता, अखंडता और स्वाभिमान के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर उन्हें नमन किया गया।

भाजपा भाजपा नगर अध्यक्ष मुकेश कुमार सिंह (बब्लु) ने जयंती समारोह की अध्यक्षता की। मौके पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता उपेन्द्र सिंह ने कहा कि जिस अनुच्छेद 370 ने भारत की एकता को चुनौती दी थी, उसे डॉ मुखर्जी ने अपने बलिदान से ललकारा। भाजपा ने उसे संकल्प बनाकर निभाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दृढ़ निश्चय से इस अनुच्छेद 370 को समाप्त करके दिखाया। अब न दो प्रधान हैं, न दो संविधान, अब तो है सिर्फ एक भारत, अखंड भारत।

उन्होंने कहा कि 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे एवं शिक्षाविद् के रूप में विख्यात थे। डॉ मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक किया तथा 1921 में बीए की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करने के पश्चात् वे विदेश चले गये और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएं अर्जित कर ली थीं।

उन्होंने बताया कि 33 वर्ष की अल्पायु में डॉ मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम आयु के कुलपति थे। एक विचारक तथा प्रखर शिक्षाविद् के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरन्तर आगे बढ़ती गयी। भाजपा नेता ओमकुमार सिंह ने कहा कि डॉ मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहां का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आज़म) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था।

संसद में अपने भाषण में डॉ मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की थी। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा। उन्होंने तत्कालीन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े।

वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। कार्यक्रम के मौके पर नगर परिषद सभापति अजय शाह, दक्षिणी मण्डल अध्यक्ष सह पूर्व मुखिया दीपक शर्मा, महेश कुमार, सुनील दुबे, संजीव कुमार सिंह, दिव्यांशु गौतम, अरुण कुमार सिंह, राजन दास, दुर्गा दास, उमेश सिंह, राजेश पटेल, संजय कुमार सिंह, राजीव रंजन सिंह, जेपी सेनानी मान्धाता सिंह, उदय प्रताप, केदार गुप्ता, राकेश कुमार सिंह, सूर्याप्रकाश सिंह, पुरषोत्तम कुमार सिंह, गौतम कुमार सिंह शामिल हुए।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *