एस.पी.सक्सेना/समस्तीपुर (बिहार)। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में जिसके संविधान के मूल प्रस्तावना में समानता जैसे शब्दों का जिक्र है।
भारतीय सभ्य समाज जहाँ महिलाओं को देवी के स्वरुप में प्रचारित प्रसारित किया जाता है तथा लगातार केंद्र और राज्यों की सरकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा महिला सशक्तिकरण के लिए विशेष तौर पर अनेकों प्रयास किए जा रहे है।
इस सब के बावजूद महिलाएँ सबसे अधिक उपेक्षा की शिकार हैं। महिलाएं भय के साये में अपना जीवन व्यतीत करने को मजबूर है। उक्त बातें गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर को समस्तीपुर के शोधार्थी संदीप कुमार ने कही।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की बात करें तो आप देखेगें की बापू ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में महिला सशक्तिकरण पर जोर दिया था, लेकिन वर्तमान समय में भी जब आप अपने समाज की तस्वीरें गौर से देखेगें तो पायेंगें की लड़के और लड़कियों में आज भी फर्क किया जा रहा है। हम देखेंगे कि वर्तमान दौर में महिलाओं के सशक्तिकरण और उत्थान में महात्मा गाँधी की क्या प्रासंगिगता है?
गांधीजी के अनुसार “हमारे समाज में कोई सबसे अधिक हताश हुआ है तो वह स्त्री ही है। इस वजह से हमारा अध: पतन भी हुआ है। स्त्री-पुरुष के बीच जो फर्क प्रकृति के पहले है और जिसे खुली आँखों से देखा जा सकता है, उसके आलावा मै किसी किस्म के फर्क को नहीं मानता।”
उन्होंने कहा कि गांधी जी ने उस समय महिलाओं को देश के स्वतंत्रता आंदोलन में जोड़ने का प्रयास किया, जिस समय महिलाओं के लिए पर्दा प्रथा एक अभिशाप था। उन्होंने अपने अथक प्रयास के बाद स्त्रियों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया और जोड़ पाने में सफल भी हुए।
बापू ने अपने आश्रम में उनको समान हक व स्वतंत्रता प्रदान कर समाज में स्त्रियों का दर्जा कैसा होना चाहिए, इसकी अच्छी मिसाल हमें उनके जीवन से मिलती है।
दरअसल हमें समाज में ऐसा वातावरण निर्माण करना चाहिए कि जिस प्रकार स्त्री घर के कामकाज को पूर्ण आत्म-विश्वास तथा उत्साहपूर्वक करती है उसी तरह समाज के हर गतिविधियों में स्वतंत्र साझेदारी करने लगे और स्त्री-पुरुष दोनों स्वाभाविक सह-जीवन का आनंद उठा सकें।
हम देखेगें की तथाकथिक सभ्य भारतीय समाज में मनुष्य के रूप में यदि स्त्री का मूल्य प्रतिष्ठित नहीं होता तो स्त्री की प्रकृति संभव नहीं होती।
संदीप के अनुसार स्त्री के मूल्य को लेकर समाज बहुत ही अज्ञानी है। यह केवल पुरुष वर्ग में ही नहीं स्त्रियों में भी पाया जाता है। वर्तमान समय में भारतीय समाज को स्त्रियों के क्या-क्या कर्त्तव्य हैं, उनका क्या योगदान है?
समानताएं और असमानताएं क्या हैं? इन सबका हिसाब लगाया जाना चाहिए। आम जनमानस को इससे अवगत कराना समय की मांग है, ताकि भारतीय पुरुषवादी समाज की मानसिकताओं में परिवर्तन हो सके।
देश में भिन्न-भिन्न जातियाँ वर्ग और धर्म है। उनके विभिन्न रीति-रिवाज हैं, परंतु आजादी के 75 सालों बाद भी हमारे समाज में स्त्री का जीवन बेहद कष्टदायक एवं दबा-सहमा हुआ ही दिखाई देती है।
शोधार्थी संदीप के अनुसार महिला सशक्तिकरण का प्रश्न हमारी सरकार की योजनाओं, बुद्धिजीवियों, समाज सुधारकों एवं नेताओं के लिए बैनर-पोस्टरों, नारों और भाषणों में चिंता का विषय हम अधिक देख पाते हैं।
वास्तविकताओं के धरातल पर कुछ अलग ही तस्वीरें नजर आती प्रतीत होती है। फिर भी, कुछ आंशिक तौर पर महिलाओं को सशक्त कर पाने में हम सफल हो पाएं हैं। जो बेहद ही निराशाजनक आकड़ें पेश करती है।
उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण में महिलाओं की भूमिका बहुत ही महतवपूर्ण है। देश की समग्र प्रगति तब तक नहीं हो सकती, जबतक उस देश की राजनीति से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में वहां की महिलाएं सशक्त बनकर न उभरी हो।
लेकिन हमारे देश और समाज की विडम्बना यह है कि तमाम प्रभावी नीतियों और योजनाओं के वावजूद हकीकत यह है कि महिलाएं व्यावहारिकता में तरह-तरह की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझ रही हैं।
निश्चित तौर पर हमें यह मानना होगा कि जब तक परिवार और समाज सकरात्मक सोच के साथ आगें नहीं बढेगा, तब तक महिलाओं के विकास और शक्तिकरण की बाते करना महज कल्पना ही होगी।
संदीप के अनुसार भारतीय समाज को समझने की जरुरत है कि महिला सशक्तिकरण के सही मायने क्या है? हमारा समाज महिला सशक्तिकरण को किस रूप में देखता है? आखिर महिलाओं के सशक्तिकरण से किसको भय है? उन्होंने कहा कि किसी भी देश के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक एवं नैतिक विकास में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है।
गाँधी जी इस सत्य से पूरी तरह अवगत थे। इसीलिए गांधी जी का मानना था कि विकास की धारा से यदि स्त्रियों को जोड़ा नहीं गया तो विकास की परिकल्पना कभी साकार नहीं हो सकेगी।
उन्होंने बताया कि महात्मा गाँधी जी ने ‘यंग इडिया’ में स्त्रियों के अधिकारों पर बल देते हुए लिखा था कि “स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता नहीं कर सकता।
मेरी राय में उन पर ऐसा कोई क़ानूनी प्रतिबन्ध नहीं लगाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और कन्याओं में किसी तरह का भेद नहीं होना चाहिए। उनके साथ पूरी समानता होनी चाहिए।”
इन विचारों को गांधी जी ने सैद्धांतिक रूप में रखा नहीं बल्कि अपने व्यवहार में भी इस का कार्यान्वयन किया है। इसके उदाहरण अभी भी आश्रम के रूप में जीवित हैं। गांधी जी के मानस-पटल में यह बात स्पष्ट थी कि “महिला सशक्तिकरण केवल नैतिक अनिवार्यता नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक परम्पराओं को सुदृढ़ करने तथा अन्याय व उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करने की पूर्व शर्त भी है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जिसके लिए पूरी दुनिया में जोरदार अभियान चलाने की जरूरत है, क्योंकि विश्व का एक बड़ा हिस्सा आज भी शिक्षा के अधिकार से वंचित है। शिक्षा के विषय पर गांधी के विचार पूर्णतः स्पष्ट थे।
गांधी कहते हैं कि स्त्रियों की विशेष शिक्षा का रूप क्या हो और वह कब से आरम्भ होनी चाहिए। इस विषय में यद्यपि मैंने सोचा और लिखा है, पर अपने विचारों को निश्चयात्मक नहीं बना सका।
इतनी तो पक्की राय है कि जितनी सुविधा पुरुष को है, उतनी ही स्त्री को भी मिलनी चाहिए। महिला सशक्तिकरण से तात्पर्य महिलाओं को राजनैतिक, शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक स्तर पर सशक्त बनाना है।
स्त्रियों को विकसित होने के समान अवसर उपलब्ध कराते हुए उन्हें स्वावलम्बी बनाना एवं अपने मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना महिला सशक्तिकरण का केन्द्रीय बिंदु है।
सरल शब्दों में यदि महिला सशक्तिकरण की व्याख्या की जाये तो स्त्रियों को उनके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में निर्णय लेने की स्वाधीनता प्राप्त हो। चाहे वह शिक्षा या रोजगार सम्बंधी निर्णय हो या विवाह से जुड़ी स्वतंत्रता।
इन निर्णयों को किसी विशेषाधिकार की दृष्टि से न देखा जाकर किसी सामान्य मनुष्य को प्राप्त सामान्य व्यक्तिगत अधिकारों की भांति दृष्टिगोचर करना ही वास्तविक महिला सशक्तिकरण है।
वर्तमान समय की मांग है कि गांधीजी से सीख लेते हुए भारतीय समाज के हर प्रगतिशील व्यक्ति को महिलाओं के चहुमुखी विकास में सहयोगात्मक कदम उठाते हुए महिला सशक्तिकरण के प्रति अपनी विकृत सोच और मानसिकताओं को बदलते हुए आगे बढ़ने में सहयोगात्मक भूमिका निभानी चाहिए जिससे हमारे समाज में लोकतांत्रिक ताने बाने का विस्तार हो सके.
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