सुनील मंथन शर्मा/ मुंबई। अंजाने सफर में ”जिसका कोई नहीं, उसका खुदा होता है” इस कहावत को देश की आर्थिक राजधानी महानगर मुंबई में नाना पालकर स्मृति समिति चरितार्थ कर रही है। इस समिति ने बेसहारा कैंसर के मरीजों को पालकर सदन में ठाट-बाट से रहने, खाने के साथ- साथ डॉयलिसिस आदि का भी बेहतर इंतजाम किया है। बता दें कि मुंबई में हजारों ऐसी संस्थाएं व ट्रस्ट हैं जो देश के विभिन्न राज्य एवं शहरों से आने वाले मरीजों की तन-मन और धन से सेवा करते हैं।
इनमें मुंबई के परेल पूर्व स्थित नाना पालकर स्मृति समिति सबसे आगे है। महज 10 मंजिले इस इमारत में 76 मरीजों के साथ उनके सहयोगियों के रहने की व्यवस्था भी है। इस सदन में टाटा मेमोरियल सेंटर, महात्मा गांधी रुग्णालय, किंग जार्ज मेमोरियल अस्पताल, वाडिया अस्पताल, केईएम अस्पताल व अन्य बड़े अस्पतालों के मरीजों को इलाज के दौरान रहने की जगह दी जाती है।
इस सदन में जांच केन्द्रों के अलावा कैंटीन और पूजा घर भी है। महज 6 बेड से शुरू हुए सीता सदन ही समिति की शुरूआत है। बता दें कि नाना पालकर स्मृति समिति की स्थापना 1 मार्च 1968 में स्वर्गीय नारायण हरी पालकर के निधन के बाद तकरीबन 100 सदस्यों ने किया था। उनका निधन 1967 में मुंबई के परेल क्षेत्र में ही हुआ था। फिलहाल समिति के अध्यक्ष डॉ़ अजीत फड़के और सचिव किरण करणकर हैं।
इस कड़ी में दिलचस्प बात यह है कि 1968 में बनी इस समिति के कार्यों को देखते हुए बृहन्मुंबई महानगरपालिका ने 1999 में इस जमीन को 99 सालों के लिए लीज पर दे दिया है। लगभग एक दशक से चल रहे इस सेवा सदन में देश के कोने- कोने के लोगों को जगह दी जाती है। समिति के सदस्य स्वर्गीय नारायण हरी पालकर के सपनों को साकार कर रहे हैं। इस सदन के व्यवस्थापक कृष्णा टी म्हाडिक की भूमिका सराहनीय है।
म्हाडिक की देख रेख में चल रहे इस सदन के अन्य कर्मचारियों का व्यवहार तथा तत्परता सराहनीय है। संस्था के सदस्य किसी भी मरीज की समस्याओं को गौर से सुनने समझने के बाद उसका निदान कराते हैं। इसके अलावा सदन में नियमित रूप से योग और सार्वजनिक प्रार्थनाएं भी होती हैं। इससे मरीजों का सेहत ठीक रहता है व पूजा से शांति मिलती है। तकरीबन एक दशक में लाखों मरीजों की सेवा करने वाली इस समिति को न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी लोग याद करते हैं। इससे समिति का कद काफी बढ़ा है।
सदन में पुस्तकालय एवं वाचनालय भी है। इसकी शाखा बोरीवली में भी है जहां चिकित्सा सुविधाएं दी जाती हैं। संस्था का हर इंसान सेवा के प्रति संवेदनशील और समर्पित है। संस्था का यह अनोखा कार्य तब संभव होता है, जब देश के समाजसेवकों का आर्थिक, सामाजिक, नैतिक सहयोग मिलता है। संस्था के इस अनोखे कार्य के लिए और भी आर्थिक सहयोग की जरुरत है, जिससे संस्था मरीजों को अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करा सके।
गौर करने वाली बात यह है कि इस मायानगरी में धनवानों की कमी नहीं है। यहां के धन-कुबेर अपना धन विदेशी बैंकों में सड़ा रहे हैं, वे सामाजिक कार्यों में भी दिलचस्पी नहीं रखते। लेकिन, ऐसे लोगों का आर्थिक सहयोग इन जैसी संस्थाओं को मिल जाये, तो यहां देश के कोने-कोने से आने वाले हर बेसहारा मरीजों को और भी बेहतर सुविधाएं मिल जाया करेंगी।
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