मुंबई। इल्म कभी जाया नहीं होती, इसे पाने के लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती, इसे जितना भी बांटों कम नहीं होता। इल्म के बिना जिंदगी अधूरी है। तालीबे इल्म को हर मुकाम पर इज्जत व शोहरत मिलती है। इन्हीं बातों को देखते हुए, किसी जमाने में बुजुर्गों ने कहा था ” पढ़ाव तो पढ़ाव, न तो शहर में बसाव ” बात पते की है। इस कौल के पीछे लंबी दास्ता है।
उस दौर में देश और दुनिया इतना तरक्की (डेव्हलप) नहीं था। हर जगह स्कूल कॉलेज नहीं थे, लेकिन दौर बदला वक़्त बदले और अब तो वक़्त की नजाकत भी बदल गई है। यानी हर मोड़ पर यह सवाल उठने लगा है कि आपकी पढ़ाई (शिक्षा, इल्म) कहां तक हुई है। इस सवाल पर कुछ लोग बगली झांकते नजर आते हैं तो कोई डंके की चोट पर यह कहता नजर आता है कि मैंने डिग्री हासिल की है, तो कोई डॉक्टर और इंजिनियर का राग अलापता दिखाई देता है। कहने का मतलब साफ है कि इस दौर में पढ़ाई के बिना जिंदगी अधूरी है। ऐसा मुंबई के अब्दुल गफ्फार खोकर का मानना है।
इसके लिए हम सभी को आगे आना होगा, तभी हमारी पीढ़ियां और हमारा देश तरक्की (प्रगति) की दौड़ में आगे आ सकता है। चूंकि हर दौर में यह देखा गया है कि ऊंची तालीम हासिल करने वाले बच्चों को ही मौका और मंजिल मिलती है। इसलिए हमें भी पढ़ाई करनी चाहिए। बेहतर तालीम के लिए बच्चों में शौक होता है या फिर वो खौफ से पढ़ते हैं। ऐसे में बच्चों में शौक है या खौफ को पहचानना लोहे के चने चबाने के बराबर है।
इस लिए बच्चों के साथ टीचर्स या गार्जियन बनने के बजाए उनसे दोस्ती का रिश्ता बनाकर उन्हें पढ़ने के लिए उत्साहित किया जा सकता है। इससे बच्चे अपनी दिल की बातों को आप के साथ साझा (शेयर) करेंगे, तभी आप उनकी भावनाओं को समझ पाएंगे। बहरहाल पढ़ाई के शौकीन बच्चों को तो आसानी से समझा जा सकता है लेकिन कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं जिन्हें शौक है लेकिन सहूलियतें न के बराबर हैं।
ऐसे बच्चों के लिए आगे की पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता है। बावजूद इसके वो अपनी पढ़ाई के लिए सहूलतें बना लेते हैं। लेकिन जिन बच्चों को पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं होती, उनके लिए हर मां बाप को अलग से वक़्त देना चाहिए और उन्हें पढ़ाई पर जोर देने के बजाय दुनियावी तालीम के बारे में बताना और समझाना चाहिए। ताकि वो किसी का मोहताज न रहे।
मौजूदा समय में देश के छात्रों में शिक्षा के प्रति ललक है, एक दूसरे को देख कर बच्चे अच्छा भी कर रहे हैं, लेकिन कई ऐसे समाज हैं जिनके पास सारी सहुलतें हैं लेकिन उनके बच्चे अब भी अशिक्षित हैं। ऐसे समाज के मानिंद लोगों को आगे आना चाहिए और समाज के बच्चों में पढ़ने की ललक जगाना चाहिए। इससे समाज बढ़ेगा तो आगे आने वाले लोगों की शान भी बढ़ेगी, इससे देश का विकास होगा और दुनिया में अलग पहचान बनेगी। आइए हम सब इसकी शुरूआत करते हैं।
यहां एक बात और भी बताना चाहता हुं कि किसी भी काम की शुरूआत अपने घर से ही की जाती है। तो हम अब अपने बच्चों से पढ़ाई लिखाई की शुरूआत दोस्त बन कर करते हैं। इससे बच्चों के मन की बात आप समझ सकेंगे और वो भी बेझिझक अपने दिल की बात आप से साझा कर सकेगा। इससे बच्चों के हौसला बुलंद होंगे। ऐसे में उनका मन पढ़ाई- लिखाई में लगेगा। यह बात सिर्फ बच्चों के लिए नहीं है बल्कि हर उम्र के लोगों के लिए है जो अशिक्षित हैं। क्योंकि शिक्षा (इल्म) हासिल करने की कोई उम्र नहीं होती।
दुनिया में शिक्षा (पढ़ाई) ही एक ऐसी दौलत है जिसे जितना बांटों, उतना ही बढ़ता है। इस लिए न केवल हम आप बल्कि हम सभी अपने और अपनों को पढ़ने और पढ़ाने पर जोर दें। ताकि हमारा समाज, हमारा देश भी दुनिया के नक्शे में इल्म के मामले में अव्वल रहे। इससे हम सभी का मान सम्मान बढ़ेगा। दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां भारतीय लोगों को अलग नजरिये से देखा जाता है। लेकिन अब हमें बेहतर इल्म हासिल कर ऐसा मुकाम बनाना है कि मैं, मेरा समाज और मेरा भारत महान का सपना पूरा करना है।
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