अतिक्रमण की भेंट चढ़ा सबेया का हवाई अड्डा
सेकंड वर्ल्ड वार (Second World War) के दौरान भारतीय वायू सेना (Indian Air Force) के जवानों ने दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए सबेया हवाई अड्डे का जमकर इस्तेमाल किया और दुश्मनों पर हावी रहे। गोपालगंज जिला के हथुआ (Hathwa) में स्थित लगभग 7 किमी. परिसर में फैले सबेया का हवाई अड्डा (Sabya Airport) सन् 1901 में महाराज के सहयोग से अंग्रेजों ने बनवाया था। अब यह हवाई अड्डा भारतीय रक्षा मंत्रालय के अधीन है। बता दें कि चीन के अलावा उत्तरी सीमावर्ती छोरों की सुरक्षा के लिए यह हवाई अड्डा सबसे सुरक्षित व कारगर माना जाता है। इसके बावजूद इस हवाई अड्डे पर स्थानीय नागरीकों ने अतिक्रमण कर अपना आशियाना बना लिया है। जानकार बताते हैं कि लगभग 7 किमी. में फैले इस हवाई अड्डे की चौहद्दी में दो ग्राम पंचायतों में करीब डेढ़ दर्जन गांव बसे हैं। कयास लगाया जा रहा है कि अब इन गांवों को हटाना सरकार के बूते में नहीं है।
बहरहाल हथुआ महाराज (Hathwa Maharaj) का इतिहास कभी न खत्म होना वाली कहानी है, जैसे-जैसे पन्ने खुलेंगे अध्याय शुरू होता जाएगा। इस कड़ी में एक और दिलचस्प बात यह है कि महाराज स्वयं पायलट भी थे। उन्हें खुले आकाश में उड़ान भरना बेहद पसंद था। हथुआ स्टेट के जानकारों का कहना है कि जिस वक़्त देश के अधिकांश हिस्सों में साइकिल और मोटरगाड़ियो को लोग आश्चर्य भरी निगाहों से निहारते थे, उस जमाने में हथुआ राज द्वारा उड़नखटोला यानि हवाई जहाज उतारने एवं उड़ाया जाता था। उनका निजी विमान भी था।
हथुआ के साबेया एयरपोर्ट से सटे 108 बेडों वाले महारानी रामदुलारी कुंअर अस्पताल अंग्रेजी के ‘एच’ आक्षर जैसा है इसे वर्ष 1903 में मरीजों को बेहतर चिकित्सा मुहैया कराने के लिए बनाया गया है। उस दौर में ब्रिटेन के चिकित्सक इसी एयरपोर्ट के सहारे आते-जाते थे। करीब 7 किमी़ में फैले इस एयरपोर्ट के सभी रनवे एक दूसरे से जुड़े हैं। इस रनवे (हवाई पट्टी) से जुड़ी पार्किंग पट्टी भी है। यहां मौसम की बेरुखी से बचने के लिए कई बंकरनुमा अंडर ग्राउंड गैराज है, जो आसमान की ऊंचाई से नजर नहीं आते हैं।
सबेया हवाई अड्डा के भग्नावशेष (प्राचीन का टूटा स्वरूप) देखकर आश्चर्य होता है कि हथुआ राज (Hathwa Raj) उस जमाने में भी आधुनिक सुविधाओं से लैस था। इसे दुश्मनों पर हवाई हमले और लोहा लेने के लिए बनवाया गया था। हथुआ महाराज ने समाज के हर वर्ग अपने साथ जोड़ने के साथ- साथ सामाजिक सुरक्षा का भी पुख्ता इंतजाम किया था।
इसका उदाहरण सारण परिक्षेत्र का सबसे बड़ा तथा सुविधाओं से लैस हथुआ का रामदुलारी कुंवर अनुमंडलीय अस्पताल है। इस अस्पताल के प्राचीन भवन की बनावट अंग्रेजी के ‘एच’ अक्षर जैसा है। इसे खास तौर से ऐसा बनाया गया था। क्योंकि वार के दौरान अस्पतालों को निशाना बनाना वर्जित है। सबेया हवाई अडड रन वे के किनारे उसी जमाने का बना आलिशान कोठी है। जिसमें सेना के अधिकारी तथा राज परिवार बैठते थे। लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण ऐतिहासिक सबेया हवाई अड्डा अपना अस्तित्व खोने के कगार पर है।
राष्ट्र की सुरक्षा के मद्देनजर अति महत्वपूर्ण सबेया में लगभग डेढ़ दर्जन गांव अनाधिकृत तरीके से अतिक्रमण करके आबाद है तथा इन गांवों को मिलाकर दो ग्राम पंचायत भी बन चुके है। हालांकि कागजी तौर पर हथुआ अंचल कार्यालय तथा दानापुर (पटना) सैन्य छावनी से प्रतिवर्ष सैकड़ों अतिक्रमणकारियों पर अविलंब अतिक्रमण हटाने की नोटीस दी जाती है पर परिणाम ज्यों का त्यों है। रक्षा मंत्रालय की इस विस्तृत एयरपोर्ट की जमीन में कांधगोपी पंचायत तथा मछागर लछीराम ग्राम पंचायत ऑक्टोपस की भांति कब्जा जमाता जा रहा है।
इन पंचायतों के अलावा बढेया, कुकरभूंका, ओटनीपट्टी, साहेवाचक राजस्व ग्राम अस्तित्व में है। इसके अलावा खाली सैकड़ों एकड़ जमीन पर स्थानीय दबंगों ने कब्जा कर खेती कर रहे हैं। सबेया एयपोर्ट के विस्तृत भू- भाग में हथुआ राज द्वारा लगाए गए अनगिनत बेशकीमती महोगनी, सागवान, शीशम तथा कटहल के वृक्षों की अवैध कटाई जंगल माफियाओं द्वारा वर्षों से किया जा रहा है। वहीं एयरपोर्ट की सरकारी जमीन में अवैध खनन भी जारी है।
जानकारों की मानें तो इस एयरपोर्ट पर स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज को हवाई अड्डा के सभा मंच से संबोधित किया था। कलांतर में स्व़पंडित जवाहर लाल नेहरु, स्व. इंदिरा गांधी, श्री अटल बिहारी बाजपेयी जैसे नेताओं ने यहां अपने उद्गार रखे। लेकिन अफसोस कि बात यह है कि अब तक किसी भी नेता ने इस हवाई अड्डा की महत्ता और उपयोगिता पर ध्यान नहीं दिया। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो महज वुत्र्छ वर्षों में सबेया पूर्णतः अतिक्रमणकारियों के कब्जे में होगा!
- धार्मिक प्रवृति के हथुआ महाराज शौकीन होने के साथ-साथ प्रखर विचारों के स्वामी भी थे। उनके राजवाड़े के लोग खुशहाल थे, यहां के बुजुर्गो का कहना है कि महाराज अपनी अवाम के समर्पित थे। इनमें मछागर के 80 वर्षी भूपेंद्र सिंह का कहना है कि कोमल स्वभाव के महाराज सभी के दुख- सुख के साथी थे। इसी तरह मीरगंज के साहेबजान मिया अपने उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। लगभग 90 साल के साहेबजान चाचा का कहना है कि हमने महाराज के साथ अच्छे दिन बिताये हैं। वहीं हथुआ के बिंदेश्वरी ठाकुर लगभग 80 वर्ष के हैं, उनका कहना है कि महाराज पशु पंक्षियों के प्रेमी थे। ठाकुर बात करते- करते थोड़ा रूके फिर बोले महाराज हमारे लिए देवता समान थे। हथुआ महाराज के करीबी रहे मछागर के रामाज्ञा तिवारी भी अपने जीवन के 85 दीपावली देख चुके हैं। उनका कहना है कि महाराज की सोच अपने लोगों की मूलभूत जरूरतों पर रहती थी। इसके तहत उन्होंने पर्यावरण और कृषि पर ज्यादा जोर दिया। हथुआ राज के कालोपट्टी निवासी नबी रसूल मियां 85 साल के हैं। बता दें कि बीमार रसूल चाचा, महाराज के विषय में जवानों जैसा फुर्ती दिखाते हुए उठ कर बैठ गये। इसके बाद संवाददाता के सवाल से पहले उनहोंने महाराज की आधी जीवनी बता दी, अतः उन्होंने कहा की वो हमारे अन्नदाता थे। – मुश्ताक खान
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