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करम पर्व पर विजय शंकर नायक द्वारा विशेष

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। करम पर्व प्रकृति और संस्कृति का अटूट बंधन है। यह पर्व केवल एक पर्व नही बल्कि प्रकृति और मानव के बीच सहजीवन का उत्सव है। यह विचार हैं आदिवासी मुलवासी केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक के।

नायक के अनुसार करम पर्व भारत के पूर्वी राज्यों यथा झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, असम और पश्चिम बंगाल में मनाया जाने वाला एक जीवंत पर्व है, जो प्रकृति पूजा, सामुदायिक एकता और आदिवासी मूलवासी परंपराओं का प्रतीक है।

करम पर्व की आत्मा: प्रकृति और संस्कृति का अटूट बंधन

करम पर्व का मूल आधार प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा है। यह पर्व करम वृक्ष की पूजा के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जो आदिवासी मूलवासी समुदायों के लिए जीवन, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक है। भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी (2025 में 3 सितंबर) को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच सहजीवन का उत्सव है।

करम वृक्ष, जिसे करम पर्व का प्रतीक माना जाता है, न केवल सांस्कृतिक, बल्कि पारिस्थितिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह वृक्ष मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है, पक्षियों और कीटों के लिए आवास प्रदान करता है, और अपनी घनी छाया से गर्मी में राहत देता है। करम पर्व के दौरान इसकी शाखा (करम डाली) की पूजा और विसर्जन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसके संरक्षण का संदेश देता है। आधुनिक संदर्भ में, यह पर्व हमें वृक्षारोपण और जैव-विविधता संरक्षण की प्रेरणा देता है, जो जलवायु परिवर्तन के दौर में अत्यंत प्रासंगिक है।

लोककथाओं में छिपा दर्शन

करम पर्व की लोककथाएँ केवल कहानियाँ नहीं, बल्कि जीवन दर्शन और नैतिकता का खजाना हैं। एक प्रसिद्ध कथा सात भाइयों की है, जिसमें करम पूजा की उपेक्षा से परिवार पर विपत्ति आती है और पूजा के बाद समृद्धि लौटती है। यह कथा मेहनत, विश्वास और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देती है।

अनछुआ पहलू: करम और धरम की कहानी में नारी शक्ति

कम चर्चित कथा है करम और धरम भाइयों की, जिसमें उनकी बहन की भूमिका अहम होती है। कुछ क्षेत्रों में, यह कथा महिलाओं के साहस और परिवार को एकजुट रखने की शक्ति को दर्शाती है। यह पर्व, इस प्रकार, नारी सशक्तिकरण का एक प्रतीक भी है, जो आधुनिक समय में लैंगिक समानता के लिए प्रेरित करता है।

रीति-रिवाज: परंपरा और नवाचार का संगम

करम पर्व के रीति-रिवाज जीवंत और विविध हैं, जो समुदाय और क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं। यहाँ कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर किया गया है, जो इस पर्व को और आकर्षक बनाते हैं।

करम डाली का प्रतीकात्मक महत्व

करम डाली को नदी में स्नान कराकर स्थापित करने की प्रक्रिया केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संवाद का एक रूप है। कुछ समुदायों में, डाली को सजाने के लिए प्राकृतिक रंगों और जड़ी-बूटियों का उपयोग होता है, जो पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को दर्शाता है।

जावा पूजा: उर्वरता का उत्सव

झारखंड के मुंडा समुदाय में ‘जावा’ (धान के अंकुर) की पूजा एक अनूठी परंपरा है। यह न केवल फसल की समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि जीवन चक्र और पुनर्जनन का भी द्योतक है। यह परंपरा हमें खेती की जैविक विधियों और स्थानीय बीज संरक्षण की याद दिलाती है।

करम गीत: सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षक

करम पर्व के लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक इतिहास के वाहक हैं। इन गीतों में प्रकृति, प्रेम और सामाजिक मूल्यों की कहानियाँ होती हैं। एक अनछुआ पहलू यह है कि कुछ क्षेत्रों में ये गीत मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं, जो आदिवासी मूलवासी समुदायों की साक्षरता पर निर्भरता के बिना ज्ञान संरक्षण की शक्ति को दर्शाता है।

करमा नृत्य: ऊर्जा और ध्यान का मेल

करमा नृत्य, जिसमें पुरुष और महिलाएँ मांडर की थाप पर वृत्ताकार गति में नृत्य करते हैं, केवल उत्सव का हिस्सा नहीं है। कुछ समुदाय इसे एक प्रकार की सामूहिक ध्यान साधना मानते हैं, जो मन को शांत करता है और सामुदायिक एकता को बढ़ाता है। यह नृत्य तनावमुक्ति और शारीरिक स्वास्थ्य का भी स्रोत है।

क्षेत्रीय विविधताएँ

ओडिशा में ‘करम संन’ के रूप में मनाए जाने वाले इस पर्व में विशेष पकवान, जैसे ‘पिठा’ और ‘खीरी’, तैयार किए जाते हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ में कुछ समुदाय करम डाली को गाँव में घुमाने के बाद सामूहिक भोज आयोजित करते हैं, जो सामाजिक समरसता को बढ़ाता है।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव: एक अनदेखा दृष्टिकोण

करम पर्व सामाजिक एकता का प्रतीक है, जो जाति, धर्म और सामाजिक स्थिति की दीवारों को तोड़ता है। गाँव के रहिवासी एक साथ पूजा, नृत्य और भोज में शामिल होते हैं, जो सामुदायिक बंधनों को मजबूत करता है।

अनछुआ पहलू: आर्थिक प्रोत्साहन

करम पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देता है। पूजा सामग्री, पारंपरिक वस्त्र, और मांडर-नगाड़े जैसे वाद्य यंत्रों की बिक्री इस दौरान बढ़ती है। स्थानीय कारीगरों और छोटे व्यापारियों को इस पर्व से आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत मिलता है। साथ ही, सामुदायिक मेलों का आयोजन स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देता है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव

करम पर्व सामूहिक उत्सव के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। नृत्य और गीत तनाव को कम करते हैं, जबकि सामुदायिक भागीदारी आत्मविश्वास और सामाजिक समर्थन की भावना को जन्म देती है। यह विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है, जो अक्सर सामाजिक और आर्थिक हाशिए पर होते हैं।

आधुनिक चुनौतियाँ और नवाचार

आधुनिक समय में करम पर्व कई चुनौतियों का सामना कर रहा है:शहरीकरण और पलायन: युवा पीढ़ी शहरों की ओर पलायन कर रही है, जिससे वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट रहे हैं। पर्यावरणीय क्षरण: कदंब वृक्षों की कटाई और नदियों का प्रदूषण इस पर्व की मूल भावना को प्रभावित कर रहा है। पश्चिमी प्रभाव: पारंपरिक लोकगीत और नृत्य की जगह आधुनिक मनोरंजन ले रहा है।

करम पर्व को जीवंत बनाने के लिए सुझाव

1.सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन: स्कूलों और कॉलेजों में करम पर्व पर आधारित नृत्य और गीत प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँ।
2. डिजिटल मंचों का उपयोग: करम पर्व की कहानियों और रीति-रिवाजों को डिजिटल कहानियों, ब्लॉग्स और वीडियो के माध्यम से प्रचारित किया जाए।
3.पर्यावरणीय जागरूकता: करम पर्व को वृक्षारोपण और नदी संरक्षण जैसे अभियानों से जोड़ा जाए, ताकि यह आधुनिक पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बने। 4.सामुदायिक भागीदारी: गाँवों में सामुदायिक मेलों और भोजों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि सामाजिक एकता मजबूत हो।

निष्कर्ष: करम पर्व का जीवंत भविष्य

करम पर्व प्रकृति, संस्कृति और सामाजिकता का एक अनूठा संगम है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। इसके अनछुए पहलू—जैसे जावा पूजा, करम गीतों का ऐतिहासिक महत्व, और नारी सशक्तिकरण का संदेश—इसे और भी समृद्ध बनाते हैं।

2025 में, जब 18 सितंबर को यह पर्व मनाया जाएगा, यह हमें एक बार फिर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामुदायिक एकता का संदेश देगा। आइए, इस करम पर्व पर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोएँ, कदंब वृक्ष की छाया में एकजुट हों और प्रकृति के साथ अपने बंधन को मजबूत करें। यह पर्व न केवल एक उत्सव है, बल्कि एक प्रेरणा है—प्रकृति को संरक्षित करने, संस्कृति को जीवित रखने और समाज को एकजुट करने की।

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