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सारंडा की बीहड़ों में समाजसेवी संतोष पंडा ने मनाई रंगों की अनोखी होली

समाजसेवी ने कलेईता गांव के बच्चों संग खेली खुशियों की होली

सिद्धार्थ पांडेय/चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम)। झारखंड-ओडिसा सीमा पर स्थित सारंडा के दुर्गम जंगलों में होली का पावन पर्व इस साल भी खुशियों और मानवता के रंग से सराबोर रहा। सारंडा के प्रसिद्ध समाजसेवी संतोष पंडा हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी बीते 4 मार्च को सारंडा बन प्रमंडल के कलेईता गांव पहुंचे और उनके द्वारा चलाया जा रहा सारंडा की शिशु विकास स्कूल के नन्हे-मुन्ने बच्चों के साथ हंसी–खुशी के रंग बिखेरे।

बताया जाता है कि समाजसेवी पंडा अपने साथ रंग, अबीर, पिचकारी और होली की सामग्री लेकर पहुंचे। जंगल के बीच रहने वाले बच्चों के चेहरों पर रंग लगते ही माहौल खुशियों से भर गया। ज्ञात हो कि कलेईता गांव के बच्चे हर साल उनकी राह देखते हैं। उनको देख घरों से भाग भाग कर होली खेलने के स्थान पर आते आते चलते रहे पंडा भैया आ गए जल्दी चलो होली खेलना है। इस बार भी बच्चों का उत्साह देखने लायक था।

मिट्टी और राख से होली खेलते बच्चों ने बदली पंडा की सोच

समाजसेवी संतोष पंडा ने 5 मार्च को विशेष भेंट में बताया कि वर्षों पहले उन्होंने बच्चों को मिट्टी और चूल्हे की राख से होली खेलते देखा था। जब उन्होंने कारण पूछा तो बच्चों ने तब कहा था कि हमारे पास रंग नहीं है, इसलिए हम मिट्टी से होली खेल रहे हैं। उस दिन से उन्होंने संकल्प लिया कि हर साल वे इन बच्चों के लिए रंग और खुशियां लेकर पहुंचेंगे। कहा कि होली सिर्फ त्योहार नहीं, बच्चों के चेहरे की मुस्कान है। उन्होंने कहा कि सारंडा के देवतुल्य बच्चों के साथ होली खेलना उनके लिए सौभाग्य की बात है। कहा कि ऊपरवाला मुझे हर साल इन मासूमों के बीच आकर रंग और मुस्कान बांटने की शक्ति देता रहे, यही मेरी प्रार्थना है।

जंगल के बीच रंगों का त्योहार देखकर ग्रामीण भी भावुक हो उठे। कलेईता जैसे बीहड़ क्षेत्रों में जब बच्चों की हंसी गूंजती है, तो सारंडा भी रंगों से महक उठता है। इस तरह समाजसेवी पंडा ने फिर साबित किया कि त्योहार केवल मनाने के लिए नहीं, बल्कि खुशी और मानवता बांटने के लिए है।

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