एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। राज्य में सूचना आयोग और पेसा पर वर्षों से चुप्पी, रिम्स परिसर से अतिक्रमण हटाने के मामले में मात्र 72 घंटों के भीतर प्रशासन द्वारा बुलडोज़र की कार्रवाई सरकार के दोहरे मापदंड को दर्शाता है। उक्त बाते आदिवासी मूलवासी नेता विजय शंकर नायक ने कही।
झारखंड में न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर असमानता और दोहरे मापदंडों को उजागर करते हुए 18 दिसंबर को आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केन्द्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने देश के राष्ट्रपति एवं भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक संयुक्त पत्र ईमेल के माध्यम से भेजा है। प्रेषित ईमेल पत्र में राज्य के उन संवैधानिक मुद्दों पर चिंता जताई गई है, जिन पर वर्षों से न्यायिक व्यवस्था मौन बना है, जबकि अन्य मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई देखने को मिल रही है।
नायक ने बताया कि पत्र में यह जानकारी दी गयी है कि राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति तथा पेसा अधिनियम, 1996 के प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित जनहित याचिकाएँ झारखंड उच्च न्यायालय में कई वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं। आज पांच वर्ष से अधिक हो चुके है, बावजूद इसके अबतक सुचना आयुक्तों की नियुक्ति नही हो सकी है। कहा में इन मामलों में केवल तारीख़ें तय होती रही है। हलफनामे और सप्लीमेंट्री हलफनामे दाखिल होते रहे हैं, लेकिन कोई समयबद्ध और निर्णायक आदेश अब तक नहीं आया है।
इसका परिणाम यह हुआ है कि सूचना का अधिकार निष्क्रिय हो गया है और अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों का स्वशासन कमजोर पड़ गया है। जबकि इसके विपरीत, राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) परिसर से अतिक्रमण हटाने के मामले में झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर मात्र 72 घंटों के भीतर प्रशासन ने बुलडोज़र चलाकर कार्रवाई कर दी। कहा कि यह विरोधाभास यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सरकार और शक्तिशाली तंत्र से जवाबदेही तय करने वाले मामलों में न्यायिक सख़्ती जानबूझकर कम कर दी जाती है, जबकि आम नागरिकों से जुड़े मामलों में तुरंत कठोर कदम उठाए जाते हैं।
नायक ने पत्र में यह भी स्मरण कराया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई 2025 को निर्णयों में अत्यधिक देरी को अस्वीकार्य बताया था तथा 12 नवंबर 2025 को उच्च न्यायालयों को निर्णयों में देरी से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश देकर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल दिया था। इसके बावजूद झारखंड में जनहित से जुड़े मामलों की स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं होना चिंता को और गहरा करता है।
यह पूरी परिस्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19(1)(a) (सूचना का अधिकार) और पाँचवीं अनुसूची की भावना के प्रतिकूल बताई गई है। इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, बल्कि झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर भी संकट खड़ा होता है। पत्र के माध्यम से राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया गया है कि वे संविधान के संरक्षक के रूप में हस्तक्षेप करते हुए इन लंबित जनहित याचिकाओं पर समयबद्ध और प्रभावी निर्णय सुनिश्चित कराएँ, ताकि न्याय की समानता बहाल हो।
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