नौलखा मन्दिर में श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ संपन्न
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में विश्व विख्यात हरिहरक्षेत्र सोनपुर के प्रसिद्ध श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम् दिव्य देश नौलखा मन्दिर में 24 जुलाई को श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ का विधिवत समापन हो गया।
श्रीमद्भागवत सप्ताह के सातवें और अंतिम दिन कथा व्यास जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि भारतीय संस्कृति का विश्वकोश श्रीमद्भागवत महापुराण है। उन्होंने कहा कि हमारे लिए सभी पुराण आदरणीय हैं, पर इस कलि काल में सर्वाधिक आदरणीय पुराण अगर कोई है तो वह श्रीमद्भागवत पुराण है।
यह पुराण कथा हमेशा से हिन्दू समाज की धार्मिक, सामाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा हैं। उन्होंने कहा कि भागवत पुराण में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ एवं रहस्यमय विषयों को अत्यन्त सरलता के साथ निरूपित किया गया है। इसे भारतीय धर्म और संस्कृति का विश्वकोश कहना अधिक समीचीन होगा।
स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने कहा कि परिवर्तन संसार व प्रकृति का नियम है। हम सभी को प्रकृति के नियमानुसार इस धरा और धर दोनों को छोड़ कर एक दिन जाना है।उन्होंने कहा कि बड़े बुजुर्गो का कभी भी मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। अधिक भोग-विलास के कारण यदुवंशी का संयम और शील जाता रहा।
इन्हीं दिनों कुछ तपस्वी ऋषि -मुनि द्वारका पधारे। अपनी मस्ती में मस्त यादव गण उन महात्माओं का मजाक उड़ाने के लिए साम्ब नाम के राजकुमार को स्त्री की पोशाक पहनाकर ऋषियों के सामने ले गए और उनसे पूछा, आप सभी शास्त्रों के ज्ञाता हैं। अच्छा ये बताइए कि इस स्त्री का पुत्र होगा या पुत्री?
स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि यादवों के इस झूठ और नटखटपन से ऋषियों को क्रोध आ गया। उन्होंने शाप दिया कि इस स्त्री को एक मूसल होगा। वही तुम्हारे कुल का नाश करेगा। यह शाप सुनकर यादव गण चौंक गए। समय आने पर ऋषियों के कहे अनुसार स्त्री वेषधारी साम्ब को एक मूसल पैदा हुआ। इस पर यादवों की घबराहट और बढ़ गई। वे डरे और सहमे हुए थे।
आखिर सभी ने मूसल को जलाकर भस्म कर दिया और उस भस्म को समुद्र के किनारे बिखेर दिया। यादव गण यह सब कुछ करने के बाद निश्चिंत हो गए। कुछ दिनों बाद समुद्र के किनारे उसी राख से घास पैदा हुई। इसके कई दिनों तक सभी यादव शराब के नशे में समुद्र तट की सैर करते और मदिरा पीकर नाचते गाते।
एक बार दो यादवों को आपस में बहस होने लगी। दोनों की इस बहस के बाद भयंकर झगड़ा शुरू हो गया। आपस में मार-काट होनी लगी और प्रद्युम्न भी मारे गए।यह देख श्रीकृष्ण भी क्रोध में आ गए और समुद्र-किनारे जो लंबी घास उगी हुई थी, उसी का एक गुच्छा उखाड़कर विपक्षियों पर टूट पड़े। फिर क्या था सभी यादवों ने एक-एक घास का गुच्छा उखाड़ लिया और उसी से एक दूसरे पर वार करने लगे।
लक्ष्मणाचार्य के अनुसार ऋर्षियों के शाप के प्रभाव से मूसल की राख से उगे घास के पौधे यादवों के उखाड़ते ही मूसल बन गए और ये यादव उन्ही मूसलों से आघात करते हुए मारे गए। शराब के नशे में हुए इस फसाद से सारा यादव वंश नष्ट हो गया।
बलराम ने ले ली थी योग समाधि
स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि अपने वंश का नाश होते देखकर बलराम ने योग समाधि ले ली और श्रीकृष्ण भी एक वृक्ष के नीचे ध्यान- मग्न हो गए। इस बीच एक व्याधा ने उनके तलवे को हिरण समझकर तीर मारा, जिसके कारण वह भी बैकुंठ धाम की ओर चले गए।
श्रीमद्भागवत कथा श्रवण से मृत्यु का नहीं होता भय
समापन दिवस प्रसंग में स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने कहा कि शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिन तक श्रीमद्भागवत कथा सुनाई, जिससे उनके मन से मृत्यु का भय निकल गया। तक्षक नाग आता है और राजा परीक्षित को डस लेता है। राजा परीक्षित कथा श्रवण करने के कारण भगवान के परमधाम को पहुंचते हैं। इसी के साथ कथा का विराम हो गया। कथा विराम के पश्चात श्रीमद्भागवत का पूजन, हवन और अंतिम में महाभण्डारे का महाप्रसाद सैकड़ों श्रद्धालुओं ने श्रद्धा से ग्रहण किया।
पुरूषोत्तम मास अधि श्रावण मास में पावन अनुष्ठान को सफल बनाने में समाजसेवी लाल बाबू पटेल, लक्ष्मीनारायण झा, मन्दिर प्रबंधक नन्द कुमार बाबा, दिलीप झा, रतन कुमार कर्ण, श्रीमन्नारायण ओझा, पंडित विरेन्द्र शास्त्री, पंडित गोपाल झा, पंडित शिव कुमार झा, शिव नारायण शास्त्री, ज्योतिषाचार्य नन्द किशोर तिवारी, सत्येन्द्र सिंह, भोला सिंह, राजीव नयन सिंह, कुसुम देवी, फूल झा, नारायणी, निलीमा आदि का सराहनीय योगदान एवं श्रमदान अतुलनीय रहा।
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