अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर प्रखंड के सबलपुर हस्ती टोला में स्थित गंडकेश्वर नाथ महादेव की लीला अपरंपार है। श्रावण माह में यहां ग्रामीण स्तर का सोमवारी मेला लगता है। जिसकी तैयारी इस बार भी पूर्ण कर ली जा चुकी है।
यह मंदिर और मूर्ति हरिहरनाथ मंदिर से सटे दक्षिण मही एवं गण्डकी नदी किनारे सबलपुर पूर्वी पंचायत में स्थित श्रीराम जानकी ठाकुरबाड़ी में स्थापित है। भगवान शिव की यहां अद्भुत खड़ी प्रतिमा है। यहां स्वयं शिव का त्रिशूलधारी रूप विराजमान हैं। पास में ही एक शिव लिंग भी है, जिस पर भक्तगण जलाभिषेक करते हैं।
कहा जाता है कि जबसे यह मूर्ति यहां स्थापित की गयी है आसपास के इलाकों में सुख-समृद्धि का वास हो गया है। जो मामले कोर्ट तक पहुंच जाते थे वे अब बाबा के समक्ष बैठकर सुलझाये जाते हैं। इसलिए श्रावण एवं कार्तिक माह में इस मंदिर में भक्तों व दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ आती है।
विधि-विधान के साथ भगवान शिव की प्रतिमा एवं शिव लिंग की यहां पूजा-अर्चना और आरती होती है। श्रावण माह के प्रत्येक सोमवार को भक्तों द्वारा श्रीराम जानकी ठाकुरबाड़ी की सजावट की जाती है और भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है।
बाबा गंडकेश्वर नाथ महादेव के नाम से भी है इस मंदिर की पहचान
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार लगभग डेढ़ दशक पहले भगवान शिव की यह प्राचीन मूर्ति गंडक नदी के गर्भ से प्राप्त हुई थी। भक्तों ने तब लाकर उसे विधि-विधान के साथ श्रीराम जानकी ठाकुरबाड़ी में स्थापित कर दिया।
निकट ही नंदी जी महाराज हैं। मंदिर में पूजा-अर्चना व नित्य आरती करने वाले भक्त विनोद बाबा बताते हैं कि यहां शिव मूर्ति की स्थापना हो जाने के बाद अब गांव के रहिवासी श्री राम जानकी शिव मंदिर ठाकुरबाड़ी कहकर भी पुकारते हैं।वैसे यह पूर्णतः वैष्णवों का स्थान है।यहां प्रत्येक रविवार को शिव चर्चा मंडली द्वारा शिव चर्चा होती है। इसके अलावे अन्य दिनों में शिव चर्चा, भजन-कीर्तन होता रहता है।निकट ही गायत्री माता की मूर्ति भी स्थापित है।
श्रीराम जानकी ठाकुरबाड़ी के प्रथम मूल वैष्णव पुजारी संत वृक्षा दास महाराज थे। उनके गो-लोकवासी होने के बाद उनके शिष्य गंगा दास महाराज पुजारी हुए।उनके समय में इस स्थान को पूरे सबलपुर में लोकप्रियता हासिल हुई।उनके देहावसान के बाद जय मंगल दास हुए। इनकी मृत्यु के बाद स्थानीय भक्तों ने मंदिर व्यवस्था की कमान संभाली, जिसमें स्व.वासुदेव दास शामिल हैं।
वर्तमान में स्थानीय भक्त विनोद बाबा ही मंदिर की व्यवस्था सहयोगियों संग निभाते हैं। इस ठाकुरबाड़ी के मूल मंदिर के गर्भ गृह में भगवान श्रीराम, सीता जी, लक्ष्मण जी, हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है, जबकि भगवान शालिग्राम शीला स्वरुप विराजमान हैं।
जिनकी प्रतिदिन सुबह और शाम पूजा-आरती होती है। पूजा पाठ के बाद स्त्री हो या पुरुष सभी शिवलिंग के आसपास घूमकर परिक्रमा भी करते हैं। भगवान शिव की मूर्ति पूजा में जल से ही अभिषेक का विधान है, जबकि शिवलिंग की पूजा में दूध, दही, केसर, रुद्राक्ष आदि का उपयोग होता हैं।
नागराज वासुकी हैं शिव के गले का हार
भगवान शिव के गले में शोभायमान सर्प उनके आभूषण हैं। वास्तव में ये नागराज वासुकी हैं।समुद्र मंथन के समय इन्हीं नाग राज रस्सी के रूप में प्रयुक्त हुए थे। नागराज वासुकी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनको अपने गले का आभूषण बना लिया था।
वे भगवान शिव के परम भक्त थे। पुराणों के अनुसार सर्वप्रथम शिवलिंग की पूजा का प्रचलन भी नाग जाति के द्वारा शुरू किया गया था। भगवान शिव ने वासुकी की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपने गणों में शामिल कर लिया था। तब से वे शिव के होकर रह गए।
भगवान शिव के हाथ में है त्रिशूल
भगवान शिव को सभी तरह के अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान है। मान्यता है कि भगवान शिव रज, तम, सत इन तीन गुणों के साथ प्रकट हुए थे, जो त्रिशूल के रूप में भगवान शिव का अंश बने। इन तीनों गुण के बिना सृष्टि का संचालन नहीं हो सकता था। इसलिए शिव ने इनको अपने हाथों में धारण किया।
त्रिशूल का शिव के हाथ में होने का अर्थ होता है कि वे तीनों गुणों से ऊपर हैं, अर्थात निर्गुण हैं। कई भक्तों को ऐसी भी धारणा होती है कि महादेव का त्रिशूल विध्वसंक है, पर ऐसी बात नहीं है। त्रिशूल हमेशा शिव भक्तों की विघ्न-बाधाओं से रक्षा करने का भी काम करती है। कष्टों से मुक्त भी ये त्रिशूल ही करता है।
त्रिपुंड है तीन लोकों का प्रतीक
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सती की मृत्यु के बाद शिवजी ने हवन कुंड की राख से अपने माथे पर तीन रेखाएं बनाईं, जो तीनों लोकों का प्रतीक है। इसे ही त्रिपुंड कहा जाता है। मान्यता है कि त्रिपुंड लगाने से 27 देवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने ही नंदी के रूप में अवतार लिया था। ऋषि शिलाद ने कठोर तपस्या कर वरदान में अमर पुत्र को प्राप्त किया था, जो नंदी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नंदी की कठोर तपस्या के बाद शिव ने उसे अपनी प्रिय सवारी के रूप में स्वीकार किया।
डमरु के भीतर है ब्रह्मांड का वास
सभी देवताओं की तरह भगवान शिव के पास एक वाद्य यंत्र है, जिसे डमरू कहते हैं। भगवान शिव डमरू के साथ प्रकट हुए थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सरस्वती के प्रकट होने के साथ ही सृष्टि में ध्वनि का संचार हुआ। बिना स्वर और संगीत के ये ध्वनि विहीन थी। तब भगवान शिव ने नृत्य करते हुए 14 बार डमरू घुमाया, जिससे ध्वनि, व्याकरण और संगीत से छंद व ताल उत्पन्न हुआ।
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