करींगा का डच मकबरा तथा छपरा संग्रहालय का किया अवलोकन
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। बिहार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने 15 जुलाई को सारण के जिलाधिकारी अमन समीर के साथ जिला मुख्यालय छपरा सदर प्रखंड के हद में चिरांद के पुरातात्विक स्थल, करींगा का मकबरा तथा छपरा संग्रहालय का स्थलीय निरीक्षण किया।

ज्ञात हो कि, निरिक्षण क्रम में पर्यटन के दृष्टिकोण से उक्त तीनों स्थलों को अधिक से अधिक विकसित करने तथा चिरांद के पुरातात्विक स्थल के पहुंच पथ निर्माण के लिए सम्बन्धित पदाधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिया गया। निरीक्षण के दौरान उप विकास आयुक्त यतेन्द्र कुमार पाल, अपर समाहर्ता मुकेश कुमार, जिला कला संस्कृति पदाधिकारी डॉ विभा भारती, सदर अनुमंडल पदाधिकारी नीतेश कुमार, अंचलाधिकारी सदर तथा थानाध्यक्ष उपस्थित रहे।
संरक्षित स्मारक घोषित है 300 वर्षों पुराना डच मकबरा
ध्यान देने योग्य है कि, चिरांद स्थित डच मकबरा 300 साल पुराना है। बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय ने इस ऐतिहासिक मकबरे को बिहार प्राचीन स्मारक अधिनियम 1976 के तहत संरक्षित स्मारक घोषित किया है। बताया जाता है कि, 18वीं सदी के डच गवर्नर जौकबस वान हार्न की याद में इस मकबरा का निर्माण किया गया था। उस दौर में यह पूरा इलाका डच व्यापारियों का ठिकाना था। बताया जाता है कि वे यहां व्यापार करते थे और परिवार के साथ रहते भी थे।मृत्यु के बाद उन्हें यहीं दफना दिया जाता था। इतिहास के विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए यह बेहतरीन स्थल है। सारण जिला प्रशासन के प्रयास से पर्यटकों के लिए भी यह स्थान अब पसंद बनता जा रहा है।
सन् 1962-63 में हुई थी चिरांद की खुदाई
सन् 1962-63 में वी. के. सिन्हा के नेतृत्व में बिहार स्थित चिरांद नामक ग्रामीण स्थल की खुदाई हुई थी, जिसमें नव पाषाण काल के अवशेष प्राप्त हुए। खुदाई के दौरान भारी मात्रा में हिरन के सिंघो से निर्मित हथियार व औजार प्राप्त हुए है। चिरान्द के रहिवासी वृत्ताकार झोंपड़ियों में रहते थे। एक अर्धवर्त्ताकार झोंपड़ी से विशेष प्रकार के एकाधिक चूल्हों की प्राप्ति के आधार पर इसे माना जा सकता है। नव पाषाण चिरान्द से बस्तियों के साक्ष्य के साथ धान, मसूर, मूंग, गेहूं और जौ की खेती के साक्ष्य मिले हैं। चिरान्द से कूबड़दार बैल, नाग, चिड़ियों की मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।चिरांद के मृद्भांड को लाल तथा गेरुए रंगों से रंगा गया था, जिनके चमकीले बाहरी हिस्सों पर रेखीय और ज्यामितिय डिजाइन बनाए जाते थे।

यहां आवासीय स्तर के प्रमाण, तीसरी सहस्राब्दी ई.पू. के मध्य से मिलने शुरू हो जाते हैं। क्वार्टजाइट, बसाल्ट और ग्रेनाइट पत्थर के कुल्हाड़ और हथौड़े बनाए जाते थे। चाल्केडॉनी, चर्ट, एगेट तथा जैस्पर के सूक्ष्म पाषाणीय ब्लेड और प्वांइट बनाए जाते थे। हड्डी और कांटों के स्क्रेपर, घिजेल, सूई, हथौड़े, छिद्रक, पिन इत्यादि बनते थे। हड्डियों के आभूषण, कंघी, कछुए की हड्डी तथा हाथी दांत की चूड़ियां भी बनती थी।
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