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ज्ञानी के लिए संसार में दुःख व् अज्ञानी के लिए सुख है-संत प्रवर विज्ञान देव

विहंगम योग का राष्ट्रव्यापी स्वर्वेद सन्देश यात्रा पंहुची बेरमो

एस. पी. सक्सेना/बोकारो। सत्संगति हमारे जीवन को निखारती है। शरीर की पुष्टि और इन्द्रियों की तृप्ति मानव जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। मानव जीवन केवल अर्थ और काम तक सीमित नहीं है। यह लोककल्याण, आत्म-ईश्वर साक्षात्कार के लिए मिला है। ज्ञानी के लिए संसार में दुःख व् अज्ञानी के लिए सुख है। सेवा सत्संग से हीं मानव जीवन का कल्याण संभव है।

उक्त उद्गार विहंगम योग संत समाज स्वर्वेद कथामृत के प्रवर्तक संत प्रवर विज्ञान देवजी महाराज ने स्वर्वेद सन्देश यात्रा के क्रम में 2 सितंबर को बोकारो जिला के हद में फुसरो स्थित अवध सिनेमा हॉल मे आयोजित जय स्वर्वेद कथा एवं ध्यान साधना सत्र में उपस्थित श्रद्धालुओं के मध्य व्यक्त किये।

संत प्रवर ने कहा कि मन को साधें , तो जीवन अपने आप सरल हो जाएगा। बाहर की लड़ाइयाँ भीतर की हार से जन्म लेती है। आंतरिक शांति के अभाव से ही आज विश्व मे अशांति है। कहा कि जीस प्रकार आज से पांच हजार साल पुर्व महाभारत में कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम शिष्य को मन पर कंट्रोल करने की विधा बतायी थी, मन तो चंचला है। वैज्ञानिको ने भी कहा है कि मनुष्य में प्रतिदिन 60 हजार विचार उत्पन्न होता है।

उन्होंने कहा कि जितना हमारा मन शांत और नियंत्रित होगा, उतना अंतः ऊर्जा जागृत होगी। कहा कि जीस प्रकार समुद्र का तल गहरा और शांत और ऊपरी सतह पर लहर रूपी ज्वारभाटा उठता है, उसी प्रकार मनुष्य का शरीर का भीतरी अंश जो आत्मा और परमात्मा का रूप होता है वह शांत चित्त होता है जबकि ऊपरी सिरा में स्थित मन रूपी चंचला कभी स्थिर नहीं रहता। वह समुद्र की तरह हमेशा तरंगे पैदा करता रहता है।

संत प्रवर विज्ञान देव के अनुसार ताप तीन प्रकार के होते है। दैविक, भौतिक और सांसारिक। गाय के दुध को जीस प्रकार छलनी में नहीं समेटा जा सकता है, उसी प्रकार चंचल मन को नहीं बांधा जा सकता है। विहंगम योग का ग्रंथ स्वर्वेद इसी दुःख के ताप से मुक्त कराने का ज्ञान सागर है। संसार का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करना आंतरिक नहीं बल्कि वाह्य ज्ञान है। मनुष्य का जीवन चार चीजों में बंधा है, कौन हूँ मैं?

कहां से आया हूँ? क्या कर रहा हूँ और जाना कहां है? यह शरीर मिट्टी का घड़ा है, कब ठोकर लगे और टूट जाये, लेकिन प्राण नश्वर और अविनाशी है। वह कुछ काल के लिए इस मानव रूपी शरीर में विद्यमान है। जीस महान सत्ता ने उस परम ज्ञान को प्राप्त किया। उसी सत्ता के बताये मार्ग पर चलना हीं श्रद्धा और विश्वास है। जो श्रद्धावान् है वह ज्ञान की प्राप्ति कर वह शरीर से उपर हो जाता है। इसके लिए समुद्र की तल की तरह गंभीरता रखना होगा। तरंगो में संघर्ष है। हम सबके भीतर शांति का स्वरूप है। वहां परमानंद स्वरूप सच्चिदानंद का दर्शन संभव है।

संत प्रवर ने कहा कि अध्यात्म का महाशास्त्र है स्वर्वेद। स्वर्वेद आध्यात्मिक ज्ञान का चेतन प्रकाश है। जिसके आलोक में अविद्या, अंधकार, मिथ्याज्ञान नष्ट होते हैं। यह हमारी आध्यात्मिक यात्रा को सदैव जागृत रखता है। अशांति एवं वैमनस्य से पीड़ित विश्व मे शांति एवं सौहार्द की स्थापना करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम स्वर्वेद है। जीवन मे स्वर्वेद का आचरण अनन्त ऊंचाइयों तक ले जाता है। उन्होंने कहा कि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य संसार का कल्याण करना और समाज में भाईचारा कायम करना है, लेकिन आज मानव अपने उद्देश्यों से भटक गया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह कि मनुष्य शाकाहार हीं होते है। जैसे हीं वे मांसाहार की ओर अग्रसर होते है उनकी मानसिक स्थिति भटकाव में पड़ जाता है।

संत प्रवर विज्ञान देवजी महाराज की दिव्यवाणी जय स्वर्वेद कथा के रूप में लगभग 2 घंटे तक प्रवाहित होता रहा। स्वर्वेद के दोहों की संगीतमय प्रस्तुति से सभी श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो उठे। कार्यक्रम के आयोजकों यथा नीलकंठ रविदास, प्यारेलाल यादव तथा के. पी. सिंह ने बताया कि समर्पण दीप अध्यात्म महोत्सव विहंगम योग संत समाज के 102वें वार्षिकोत्सव एवं 25,000 कुण्डीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ के निमित्त संत प्रवर विज्ञान देव जी महाराज द्वारा बीते 29 जून से संकल्प यात्रा का शुभारंभ कश्मीर की धरती से प्रारम्भ किया गया है।

यह संकल्प यात्रा अबतक 19 हजार किलोमीटर तय कि जम्मू – कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार और अब बीते एक सितंबर से झारखण्ड में गतिमान है। इसी क्रम में बेरमो में राष्ट्रव्यापी स्वर्वेद सन्देश यात्रा के रूप में पहुँची है।
बताया कि आगामी 25 एवं 26 नवम्बर को विशालतम ध्यान-साधना केंद्र (मेडिटेशन सेंटर) स्वर्वेद महामंदिरधाम उमराहाँ वाराणसी के पावन परिसर में 25,000 कुण्डीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ होना है।

उसी क्रम में यह स्वर्वेद सन्देश यात्रा हो रही है। यह यात्रा कुल 40 हजार किलोमीटर तय कर भारत के दक्षिणी छोर कन्या कुमारी तक होगी। जिससे अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को पूरे भारत वर्ष में लाभ मिल सके। इस अवसर पर प्रमुख रूप से सद्गुरु संदेश पत्रिका के संपादक सुखनंदन सिंह सदय, विहंगम योग संत समाज झारखंड प्रदेश उपाध्यक्ष उदय प्रताप सिंह, प्रचार मंत्री नागेश्वर प्रसाद मेहता, बोकारो आश्रम अध्यक्ष डॉ प्रदीप कुमार प्रसाद, प्रधान सह संयोजक व् कोयलांचल प्रभारी नीलकंठ रविदास, कोयलांचल संयोजक आनंद केशरी, सह संयोजक केशव प्रसाद सिंह, कोयलांचल उपदेष्टा प्यारेलाल यादव, उपदेष्टा जानकी प्रसाद यादव, परमानंद साव, व्यवस्था प्रभारी शिवचंद यादव, प्रचारिका रेणु दास, वैदेही श्रीवास्तव, ललिता देवी, मीना देवी, पुष्पा देवी, उमा देवी, मुन्नी देवी, यशोदा देवी, जमनी देवी, आशा देवी, परमेश्वरी देवी, रीता देवी, मानिक प्रजापति, लालो प्रजापति आदि द्वारा व्यवस्था कार्य की देखरेख की गयी।

इस अवसर पर संत प्रवर विज्ञान देव के आगमन के साथ हॉल परिसर में अ अंकित श्वेत ध्वजा रोहण किया गया, तत्पश्चात दीप प्रज्वलन तथा विहंगम योग संत समाज के संस्थापक सदाफल देव, प्रथम परंपरा व् द्वितीय परंपरा सद्गुरु के चित्र पर माल्यार्पण व् नमन कर प्रवचन कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर गिरिडीह के पुर्व सांसद रविंद्र कुमार पांडेय, झामुमो नेता सह अग्रवाल कल्याण समिति झारखंड प्रदेश अध्यक्ष अनिल अग्रवाल आदि को माला पहनाकर सम्मानित किया गया। प्रवचन के अंतराल पर स्वर्वेद अमृतवाणी का संगीतमय प्रस्तुति, शांति पाठ, बीस मिनट का ध्यान क्रिया, गायत्री मंत्र, ऊँ का उच्चारण किया गया। प्रवचन का आरंभ व् समापन राष्ट्रगान जन-गण-मन से किया गया।

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