गंगोत्री प्रसाद सिंह/हाजीपुर (वैशाली)। पिछले 250 वर्षो से कायम आस्था का प्रतीक वैशाली जिला के हद में लालगंज प्रखंड के शितल भकुरहर में स्थित पीपल वृक्ष औऱ बाबन डीहा ब्रह्म स्थान धर्म, आस्था, विश्वास और मान्यताओं पर आधारित विषय वस्तु है। एक कंकड़ को मानो तो शंकर नही तो पत्थर का एक तुक्ष टुकड़ा है।
हमारे सनातन धर्म में मान्यता है कि आत्मा अमर है। इसे 84 लाख योनियों में भटकना पड़ता है। जो आत्माएं स्थूल शरीर धारण करती है उन्हें जीवात्मा कहते हैं। लेकिन कुछ आत्माएं स्थूल शरीर धारण नही करती, उन्हें सूक्ष्म आत्माएं कहते हैं। यथा प्रेत, ब्रह्म पिचास, डंकनी बहुत से नाम दिए जाते हैं।
ऐसी मान्यतायें हैं कि जिन मनुष्यों की अकाल मृत्यु होती है या जो अपने जीवन से संतुष्ट नही होते या जिन मृत मनुष्यों की संतानों ने उनका श्राद्ध कर्म ठीक से नही किया उनकी आत्माएं प्रेत योनि में भटकती है।
जीवात्मा हो या प्रेतात्मा, सभी का उद्देश्य अपने अच्छे कर्मों से परमात्मा में विलीन होना है। ऐसी भी मान्यता है कि अच्छे कर्म वालो को स्वर्ग और बुरे कर्मो वाले को नरक लोक प्राप्त होता है। लोगो को यह गलत भ्रांति है कि स्वर्ग अकाश में औऱ नरक पाताल में है। मेरा मानना है कि स्वर्ग और नरक इसी मृत्यु लोक में है।
अपने आस पास देखिए। अपने अपने कर्मो का फल लोग अपने जीवन मे ही भोग रहे हैं। जिस तरह सभी जीवात्मायें बुरी नही होती, ठीक उसी तरह कुछ प्रेतात्माएं अच्छी होती हैं, जो लोक कल्याण कर मोक्ष प्राप्ति के लिये परमात्मा से मिलन का मार्ग तैयार करती है, जिन्हें हम ब्रह्म कहते हैं।
आज मैं आप सबको अपने ग्राम शीतल भकुरहर स्थित ढाई सौ वर्षों से चले आ रहे आस्था के केंद्र ब्रह्म स्थान के सम्बंध में जानकारी साझा कर रहा हूं। सन 1700 के आसपास जब देश में औरंगजेब का शासन था।औरंगजेब के अत्याचार से त्रस्त होकर दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, गाजीपुर क्षेत्र के बहुत से सैनिक ब्राह्मण परिवार इन स्थानों से पलायन कर बिहार या देश के दूसरे क्षेत्रों में चले गए।
उसी काल मे अवध क्षेत्र के बौरिहा ग्राम जो आज उत्तरप्रदेश के गोण्डा जिले का एक गांव है, वहां से कश्यप गोत्रिय सैनिक ब्राह्मणों का एक समूह पलायन कर गण्डक नदी मार्ग से वर्तमान वैशाली जिले के हद में लालगंज के वसन्ता घाट पर आये। वे लालगंज अंचल के आस पास के गांव घटारो, चंदवारा, शीतल भकुरहर, पटेढा, प्रतापटांड, मझौली, ख़िरखौया में अपना निवास स्थान बनाया।
अपने बाहु बल और वुद्धि से खेत के जोत के मालिक बने। दसवीं पीढ़ी के एक पूर्वज सदन राय थे, जिनकी एक बहन थी। जिसकी शादी के बाद गवना नही हुआ था।
बताया जाता है कि उस समय शादी के तुरन्त बाद विदा होकर लड़कियां अपने ससुराल नहीं जाती थी। शादी के कुछ वर्ष बाद ही लड़कियां शादी के बाद अपने ससुराल जाती थी, जिसे गवना कहते हैं। शादी के तुरंत बाद विदाई न होने का कारण यह था कि उस समय लड़का लड़की की शादी कम उम्र में हो जाया करती थी।
सदन राय की बहन की जिस वर्ष शादी हुई उसी वर्ष शादी के 7 वे महीने में उनकी बहन के पति के देहांत का समाचार मिलने पर उनके परिवार में कोहराम मच गया। उस काल मे सती प्रथा बन्द हो चुकी थी, लेकिन सदन राय की बहन अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर काफी व्यथित हो गई और रात्रि में चुपके से खेत में लगे मक्के के टाल के बीच मे बैठकर अपने को अग्नि के हवाले कर दिया। इस घटना को किसी ने नही देखा।
जब सुबह में किसी ने जले मक्के के टाल के नजदीक एक लाल चुंदरी देखा तो शोर मचाया। जिस पर टोले वाले सभी दौरे। सदन राय अपनी बहन का चुंदरी देख कर रोने लगे। घर के लोगों ने सदन राय की बहन की खोज की, लेकिन जब नही मिली तो लोगों ने मान लिया कि सदन राय की बहन सती हो गई। यह घटना 1750 के आस पास की होगी। अपनी छोटी बहन के शती होने के गम में सदन राय भी कुछ माह बाद इंतकाल कर गए।
पूर्वजो द्वारा बताया गया कि सदन राय और उनकी बहन शती की आत्मा गांव घर मे भटकती रही। हर सुख दु:ख में इनकी आत्माएं यहां के रहिवासियों को महसूस होने लगी। तब गांव वालों ने विचार कर वस्ती से बाहर एक पीपल बृक्ष के नीचे शती और सदन राय का पिंड स्थापित कर दिया। कोई भी शुभ कार्य के पूर्व सती को माता औऱ सदन राय को बाबा के रूप में गांव वाले पूजने लगे।
जैसे जैसे गांव की जनसँख्या बढ़ी, बाबा सदन राय का ब्रह्म परिवार भी बढ़ा। बाबा सदन राय अब बुढऊ बाबा के नाम से जानें जाते हैं। यह स्थान बाबन डीहा ब्रह्म स्थान शितल भकुरहर के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर एक बहुत पुराना शिव मंदिर भी रहता आया, जिसका पुनर्निर्माण भव्य रूप में वर्ष 2014 में हुआ ।
लोक विश्वास और आस्था से इस स्थान पर अपना कष्ट निवारण हेतु आते है। उनका कष्ट दूर हो जाता है। ग्रामीण रहिवासियों के अनुसार प्रेत ग्रस्त रोगी इस स्थान पर आने के बाद निश्चय ही उस बाधा से उसे छुटकारा मिल जाता है।
इस स्थान का 250 वर्ष पुराने होने का कोई लिखित प्रमाण तो नही है, लेकिन सदन राय दसवे पूर्वज थे। जिस समय उनकी बहन सती हुई उस समय सती प्रथा समाप्ति पर था, जो 1750 के आस पास का काल रहा था। एक और बात जिस काल मे बाबा के आह्वान का भजन गया जाता है, उस भजन में तुर्क, पठान, मुगल को मारने का जिक्र है।
उस समय के पारम्परिक हथियार भाला और बरछी का जिक्र है। जैसे “लाली लाली बरछी हो सेवक, सवुजा हो कमान, चुनी चुनी मारबो हो सेबक मुगल हो पैठान”। निश्चय ही यह भजन मुगलो के राज्य काल की ओर इंगित करता है, जिससे यह स्पष्ट है कि इस स्थान पर स्थित पीपल बृक्ष और ब्रह्म स्थान सन 1800 के पूर्व का है।
इस स्थान पर कोई झार फूँक वाला कोई भगत नही रहता है। जिसको श्रद्धा और विश्वास है इस स्थान पर आते है। वर्ष में एक बार अश्विन माह के महालया नवमी तिथि को रात्रि में और दशहरे के दिन इस स्थान पर सामूहिक पूजा होती है। बाबा का जिसको आदेश होता है इन तिथियों को उनकी ओर से सेवक के रूप में पूजा सम्पन्न करते हैं। पूजा में सिर्फ धूप दीप जलाया जाता है।
बहुत से लोग इसे अंधविश्वास कहेंगे, लेकिन मैने पहले ही कहा है कि धर्म और मान्यता, विश्वास औऱ आस्था की विषय वस्तु है। हमारी अपने पूर्वजो के प्रति आस्था और विश्वास है। ये हमेशा अपने सन्तति की भलाई करते हैं। इसी आस्था और विश्वास के साथ हम अपने पूर्वज ब्रह्म की पूजा करते हैं।
539 total views, 1 views today