एस. पी. सक्सेना/बोकारो। सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह के 349वें प्रकाश पर्व के अवसर पर 2 जनवरी को बोकारो जिला के हद में कथारा में भव्य जुलूस निकाला गया। जुलूस ऑफिस कॉलोनी स्थित गुरद्वारा से निकलकर कथारा मोड़ होते जीएम फुटबॉल मैदान तक गया, जहां सीख युवाओं द्वारा एक से बढ़कर एक आश्चर्यजनक करतब प्रस्तुत किया गया।
इस अवसर पर कथारा गुरुद्वारा में रागी जत्था द्वारा सिक्खों का भव्य नगर कीर्तन सभा का आयोजन किया गया। नगर कीर्तन की शुरुआत गुरुद्वारा साहिब से की गयी, जो विभिन्न मार्गों से जीएम ग्राउंड तक पहुंची। इसके पश्चात पुनः गुरुद्वारा साहिब लौट गयी। नगर कीर्तन में सिख समाज के महिला-पुरुष, युवा एवं बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। गुरु ग्रंथ साहिब की पावन वाणी, गुरुवाणी कीर्तन, शबद गायन और गुरुबाणी के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा।

श्रद्धालुओं ने जगह-जगह पुष्प वर्षा कर नगर कीर्तन का स्वागत किया। जगह-जगह श्रद्धालुओं द्वारा जत्थे में शामिल जनों के लिए सिलबंद पानी का बोतल, बिस्किट आदि बांटे गये। गंगा-जमुनी तहजीब से लबरेज जुलूस में सभी धर्मों के गणमान्य जनों ने इसमें हिस्सा लिया।
इस अवसर पर वक्ताओं ने गुरु गोविंद सिंह के जीवन, त्याग और बलिदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने समाज को साहस, समानता और धर्म की रक्षा का अमर संदेश दिया, जिसे आज भी अपनाने की आवश्यकता है। नगर कीर्तन के समापन के पश्चात गुरुद्वारा परिसर में अरदास की गई तथा लंगर का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने लंगर चखा। पूरे आयोजन के दौरान शांति, सौहार्द और भाईचारे का वातावरण दिखा।
इस अवसर पर गिरिडीह के पूर्व सांसद रविन्द्र कुमार पांडेय, गुरद्वारा के ज्ञानी बाबा महेंद्र सिंह, प्रधान निशान सिंह, गुरप्रीत सिंह, सतनाम सिंह, सरदार लोचन सिंह, बोडिया दक्षिणी पंचायत के पुर्व मुखिया घनश्याम प्रसाद, सरजीत सिंह, परमजीत सिंह, बलजीत सिंह, मनोज सिंह, चरणजीत सिंह, शार्दुल सिंह सहित बड़ी संख्या में महिला संगत शामिल रही। जगह-जगह उत्साही युवाओं द्वारा पटाखे फोड़े गये तथा आतिशबाजी की गयी।

कार्यक्रम में धनबाद से आए निर्वैर खालसा गतका ग्रुप ने अपने शौर्य और कला का शानदार प्रदर्शन किया। वहीं सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अंतर्गत सभी गुरुद्वारा सिंह सभाओं की सक्रिय भागीदारी रही। आयोजन को सफल बनाने में सीखो की संस्था, गुरुद्वारा प्रबंधन समिति एवं स्थानीय श्रद्धालुओं का अहम योगदान रहा।
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