एस. पी. सक्सेना/पटना (बिहार)। बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इसके साथ ही चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की चहलकदमी तेज हो गई है। राजनीतिक दलों द्वारा रस्साकसी व् चुनावी कसरत की तैयारी जोर पकड़ ली है।
बिहार में एक बार फिर एनडीए की वापसी को लेकर जोरदार कयास लगाए जा रहे हैं। बावजूद इसके इंडिया गठबंधन भी इस बार चुनावी दंगल में बिहार के लिए एड़ी चोटी का पसीना एक की है। बिहार में राजनीति के पुराने खिलाड़ी रहे पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का परिवार जातीय समीकरण के आधार पर तथा अन्य गतिविधियों के जरिए पूरी तैयारी में है।
उनके परिवार के पुराने इतिहास को लेकर अभी तक जनता उनकी मिन्नतों को स्वीकार करने के पक्ष में दिख रही है, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। इंडिया गठबंधन के मुख्य दल कांग्रेस भी पूरी तैयारी में है, लेकिन मौजूदा परिपेक्ष्य में तथा जातीय समीकरण के आधार पर कितना गुल खिला पाती है, यह अब तक स्पष्ट नहीं है।
एक समय था, जब बिहार में कांग्रेस का झंडा बुलंद था। राज्य की जनता कांग्रेस का दीवाना था, लेकिन समय बदल चुका है। कांग्रेस की भी अब वह स्थिति नहीं रही। कांग्रेस में सबसे अधिक नेतृत्व को लेकर अविश्वसनियता है। बिहार की जनता को मौजूदा माहौल में कांग्रेस पर विश्वास जमेगा इसके लिए पार्टी हर संभव कोशिश कर रही है। गठबंधन के आधार पर तोड़मरोड़ की राजनीति में भिड़ गई है।
इधर वामपंथी दल का रुख कितना इंडिया गठबंधन के लिए लाभप्रद होगा या वह स्वतंत्र लड़ेंगे इसकी अभी अधिकृत घोषणा नहीं हुई है। सत्ता में रहने के दौरान सत्ताधारी गठबंधन की उपलब्धियां और उसकी कार्यशैली को लेकर राज्य की जनता तोल मोल में लगी है। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश कुमार अपने शासन को सुशासन होने का दवा ठोक रहे हैं। लेकिन उनका शासनकाल कितना दमदार रहा है यह तो आगामी बिहार विधानसभा का चुनाव परिणाम ही बतायेगा। अब चुनाव सिर्फ जातीय आधार पर परिणाम दिखाते हैं, कम से कम अब यह कहना बेमानी होगी। पिछले दिनों हुए कई चुनाव परिणाम इस बात के द्योतक है।
बिहार में चुनाव की तिथि की घोषणा के साथ राजनीतिक गतिविधियां केंद्र से राज्य तक सक्रिय हो गई है। सभी प्रमुख नेता ताल ठोककर मैदान में उतरकर एक दूसरे को शह और मात देने की जुगत में जनता को रिझाने में लग गये है। एनडीए भी फिर से अपनी छाप स्थापित करने के लिए यहां जदयू गठबंधन को मजबूत करने के लिए न केवल तमाम कोशिश से कर रही है। बिहार सरकार के लिए चुनावी दंगल में परिणाम ऊंट किस करवट बैठेगा अभी तक यह सिर्फ अनुमान है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार बिहार में इस बार भी पुरानी स्थिति बहाल रहने की संभावनाएं अधिक दिख रही है। बिहार में जातीय कार्ड खेलने के आधार पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने न केवल लालू से बल्की बिहार के तमाम यादव समाज से पंगा लेकर अपनी जुबानी कुश्ती शुरु कर दी है। चुनाव की तिथि की घोषणा के साथ एनडीए अपने तमाम घटक दलों को लेकर चुनावी दंगल में उतरने के लिए फील्डिंग और बैटिंग का अनुमान लगना शुरू कर दिया है। क्षेत्रीय दल भी कामोवेश अपनी स्थिति सुधारने की जुगत में है। इस बार जनता भी चुनाव परिणाम को लेकर उंगलियां गिनना शुरू कर दी है कि किस गठबंधन का अब तक क्या है दम।
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