मैं हाथ हूं,
जीवन भर का साथी हूं,
मृत्यु पर्यन्त धर्म निभाऊंगा,
क्योंकि मैं हाथ हूं।
मैंने क्या-क्या नहीं किया,
स्वतंत्रता संग्राम चलाया,
गुलामी से लड़ा,
देश को आजाद कराया।
गांधी, नेहरू, सुभाष का साथ निभाया,
संविधान रचा, वोटिंग राइट दिलाया,
फिरंगियों को उखाड़ फेंका।
तिरंगा मैंने फहराया,
वह मैं ही हूं जो बना रहा है सेटेलाइट,
मैंने आदमी का सदा साथ निभाया है।
ऊसर-बंजर में फूल खिलाया है,
इन्हीं हाथों ने इतिहास लिखा है,
अब तो मैं कर्म का प्रतीक बन गया हूं।
जो मेरा इस्तेमाल करना सीख लेता है,
मैं उसका दामन खुशियों से भर देता हूं।
नारी सशक्तिकरण में क्या मेरा हाथ नहीं?
हाथ ने ही तो बना दिया था,
भारत की बेटी को प्रधानमंत्री।
यह है कमल, कीचड़ में होता है,
सुबह खिलता है, रात को मुरझा जाता है,
अपने चाहनेवाले प्यारे भ्रमर को मार देता है।
शूट-बूट में एक बैरिस्टर आया था,
अंतरआत्मा की आवाज सुन,
धोती लंगोटी पहनना शुरू किया,
जीवन पर्यन्त पहनता रहा।
कमल वाला धोती पहन कर आया,
आज शूट पहनने का आदी हो गया,
कमल खुशबू अच्छी देता है,
लेकिन मुरझाने पर बदबू देता है,
जरा समझने की बात है।
हाथ से तो युग-युग का नाता है,
हाथ ही हमारा भाग्य विधाता है
सुना नहीं क्या अपना हाथ जगन्नाथ,
हाथ का साथ पुरानी बात,
मजबूत हाथ से जीता जा सकता है संग्राम।
हाथ की शक्ति महान।
हाथ ही है भगवान।

-मनमोहन गुप्ता
(अध्यक्ष)
गांधी विचार मंच
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