के.के.सिंह/सिवान (बिहार)। सिवान जिला (Siwan district) के हद में जीरादेई प्रखंड क्षेत्र में तीतिर स्तूप के पास बौद्ध मंदिर परिसर में सिवान के निदियों के संरक्षा विषय पर 6 सितंबर को परिचर्चा का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर शोधार्थी कृष्ण कुमार सिंह ने बताया कि प्राचीन काल में सिवान में निदियों का जाल था। आज भी आधा दर्जन नदियों का अस्तित्व यहां विद्यमान है। उन्होंने बताया कि सिवान से होकर गुजरने वाली सबसे बड़ी नदी सदानीरा यानी सरयू नदी है।
वही लघु नदिया ककुत्था (दहा), हिरण्यवती (सोना) है, जिसकी चर्चा बौद्ध साहित्य में भी किया गया है। उन्होंने बताया कि झरही, गंडकी, सियाही नदियां अभी भी विद्यमान है, पर सुखनर, धमई, नारायणी, निकरी, सतनर, सोनिया, फहारा घाटी तथा लब्दा नदियां विलुप्ति के कगार पर है।
शोधार्थी सिंह ने बताया कि सौ वर्ष पूर्व तक सारी नदियां यहां बहा करती थी। जिनका प्रमाण आज भी खतियानों में दर्ज है। मौके पर प्रमोद शर्मा ने कहा कि पूर्व में नदी ही आवागमन का मुख्य साधन था।
जिससे सिवान का क्षेत्र काफी उन्नत व संम्पन्न था, जिसका वैज्ञानिक तथा पुरातात्विक साक्ष्य सिवान के पपौर व तीतिर स्तूप के भारतीय पुरातत्व विभाग के परीक्षण उत्खनन में प्राप्त प्रमाणों से किया जा सकता है।
इस अवसर पर बौद्ध उपासक बलिंद्र सिंह, माधव शर्मा, हरिशंकर चौहान, मीरा देवी, गायत्री देवी आदि ने अपना विचार व्यक्त किया। मौके पर दर्जनों की संख्या में क्षेत्र के रहिवासी उपस्थित थे।
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