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ऑपरेशन लोट्स: मोदी शासन में लोकतंत्र पर हमला व् राजनीति का काला अध्याय-विजय

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय शंकर नायक के अनुसार भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव देश की जनता का पवित्र जनादेश है। यह जनादेश महज चुनावी नतीजों का संग्रह नहीं, बल्कि संविधान की उस आत्मा का प्रतीक है जो देश की राजनीतिक व्यवस्था को न्याय, समानता और विश्वास के धागों से बांधती है।

नायक के अनुसार देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल यानी वर्ष 2014 से लेकर अब तक, भारतीय राजनीति में एक विषैला शब्द गूंजता रहा है: ऑपरेशन लोट्स। जिसने लोकतंत्र की पवित्र भावना को तार-तार कर दिया है। यह शब्द भाजपा की उस घिनौनी रणनीति का पर्याय बन चुका है, जिसमें चुनी हुई विपक्षी सरकारों को अस्थिर किया जाता है। विधायकों को धन-बल और दबाव से दलबदल के लिए उकसाया जाता है और संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर सत्ता हथियाई जाती है।

नायक के अनुसार विपक्षी दलों का सीधा आरोप है कि मोदी सरकार इस रणनीति के जरिए जनता के जनादेश को कुचलकर, लोकतंत्र की हत्या कर रही है। कहा कि हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य राज्यों में हुई घटनाएं भारतीय संघीय ढांचे को खोखला करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को कलंकित करने का जीता-जागता प्रमाण हैं। नायक के अनुसार पीएम मोदी के इस युग में, सत्ता की भूख ने लोकतंत्र को एक क्रूर खेल बना दिया है, जहां जनता की आवाज दबाई जा रही है और संविधान की रक्षा करने वाली संस्थाएं भाजपा के लिए राजनीतिक हथियार बन चुकी हैं।

उदाहरण के तौर पर पश्चिम बंगाल में संवैधानिक पद का दुरुपयोग और मोदी सरकार का राजनीतिक टकराव के रूप में देख सकते है। कहा कि मोदी शासन के दौरान 6 मार्च को पश्चिम बंगाल में राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस के अचानक इस्तीफे ने राजनीतिक भूचाल ला दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना को सीधे केंद्र की मोदी सरकार की साजिश बताते हुए आरोप लगाया कि यह विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने की एक कड़ी है। उनकी जगह आर. एन. रवि के संभावित स्थानांतरण की अफवाहों ने इस साजिश को और पुख्ता किया है।

कहा कि भारतीय संविधान में राज्यपाल का पद संघीय संतुलन का पवित्र प्रतीक है, लेकिन मोदी के कार्यकाल में यह पद भाजपा के राजनीतिक प्यादे में बदल गया है। वर्ष 2014 से अब तक विपक्षी शासित राज्यों में राज्यपालों ने मोदी सरकार के इशारे पर राज्य सरकारों के साथ टकराव पैदा किए हैं। बिलों को रोका, फैसलों को बाधित किया और संवैधानिक संकट उत्पन्न किया।

इसी कड़ी में तमिलनाडु में राज्यपाल और मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के बीच चले विवाद ने साबित कर दिया कि मोदी राज में राज्यपाल विपक्ष को कुचलने का हथियार बन चुके हैं। यह मोदी की केंद्रवादी तानाशाही का प्रमाण है, जहां संघीय ढांचा को कमजोर कर राज्यों की स्वायत्तता छीनी जा रही है। नायक के अनुसार बिहार में मोदी के इशारे पर बदलते राजनीतिक समीकरण और जनादेश की हत्या है।

मोदी शासन के इस दौर में बिहार की राजनीति में भी एक शर्मनाक अध्याय जुड़ गया जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया। यह निर्णय मोदी सरकार की छिपी साजिश का परिणाम ज्ञात होता है, जिसने बिहार के राजनीतिक समीकरणों को उलट-पुलट कर दिया। बिहार लंबे समय से गठबंधन की राजनीति का गवाह रहा है, लेकिन मोदी के कार्यकाल में यहां की घटनाएं भाजपा की ऑपरेशन लोट्स की सफलता का उदाहरण है।

नायक ने कहा कि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह पीएम मोदी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का हिस्सा है, जहां विपक्षी गठबंधनों को तोड़कर सत्ता हथियाई जाती है। जनता के जनादेश को धोखा देकर, मोदी सरकार ने बिहार को राजनीतिक अस्थिरता के दलदल में धकेल दिया है, जिससे राज्य की विकास यात्रा ठप्प पड़ गई है और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हुई है।

इसी प्रकार मध्य प्रदेश में वर्ष 2020 का राजनीतिक संकट मोदी राज में जनादेश की पहली बड़ी हत्या है। ऑपरेशन लोट्स की घिनौनी शुरुआत मोदी शासन में ही हुई, जब वर्ष 2020 में मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार को बेरहमी से गिरा दिया गया। मुख्यमंत्री कमल नाथ की सरकार मात्र 15 महीने पुरानी थी, लेकिन मोदी सरकार के इशारे पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और 22 विधायकों को भाजपा में खरीद लिया। परिणामस्वरूप, सरकार अल्पमत में आ गई और कमल नाथ को इस्तीफा देना पड़ा।

उसके बाद शिवराज सिंह चौहान को फिर से सत्ता सौंपी गई। यह घटना मोदी के कार्यकाल में लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला था, जहां दलबदल को प्रोत्साहित कर विधायकों की निष्ठा बेची गई और जनता के जनादेश को कुचला गया। इसने पूरे देश में बहस छेड़ दी कि मोदी राज में लोकतंत्र कितना असुरक्षित हो चुका है, जहां सत्ता के लालच में संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। कर्नाटक में मोदी युग में राजनीतिक अस्थिरता का क्रूर दौर देखने को मिला जब वर्ष 2019 में कर्नाटक की कांग्रेस-जद (एस) गठबंधन सरकार भी मोदी सरकार की ऑपरेशन लोट्स का शिकार बनी।

मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी की सरकार 17 विधायकों के इस्तीफे से अल्पमत में आ गई, जो स्पष्ट रूप से भाजपा की साजिश थी। इसके बाद बी. एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी। यह प्रकरण मोदी शासन में दलबदल कानून की विफलता और उसकी सीमाओं को उजागर करता है, जहां केंद्र की ताकत से विपक्षी सरकारों को गिराया जाता है। मोदी के इस दौर में कर्नाटक राजनीतिक अराजकता का प्रतीक बन गया, जहां जनादेश के बजाय धनबल और दबाव की राजनीति हावी हो गई है और लोकतंत्र की आत्मा को घायल किया गया है।

नायक के अनुसार महाराष्ट्र में गठबंधन राजनीति का मोदी राज में संकट और जनादेश का अपमान किया गया, जब वर्ष 2022 में महाराष्ट्र की राजनीति में मोदी सरकार की साजिश ने एक और काला अध्याय जोड़ा। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की सरकार को गिरा दिया गया। शिवसेना के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने बड़ी संख्या में विधायकों को बागी बनाकर बगावत की, जो भाजपा के ऑपरेशन लोट्स का क्लासिक उदाहरण था।

इस घटना के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और मोदी के चहेते नेताओं की सरकार बनी। इस पूरे प्रकरण ने गठबंधन राजनीति को कलंकित किया। पार्टी अनुशासन को तोड़ा और संवैधानिक प्रक्रियाओं का मजाक उड़ाया। मोदी शासन में महाराष्ट्र जैसी घटनाएं साबित करती हैं कि भाजपा लोकतंत्र को अपनी सत्ता की भेंट चढ़ा रही है, जहां जनता की चुनी सरकारों को धोखे से गिराकर तानाशाही थोपी जा रही है। बताया कि झारखंड में मोदी राज में राजनीतिक संघर्ष और जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया।

झारखंड की राजनीति मोदी शासन के दौरान भयानक उतार-चढ़ाव से गुजरी है। वर्ष 2024 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी ने मोदी सरकार की राजनीतिक प्रतिशोध की पोल खोल दी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की इस कार्रवाई को विपक्ष ने साफ-साफ राजनीतिक साजिश बताया, जबकि जांच एजेंसियां मोदी के इशारे पर काम कर रही थी। मोदी के कार्यकाल में सीबीआई और ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियां विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने का हथियार बन चुकी हैं, जबकि सत्ता पक्ष के नेताओं पर कार्रवाई न के बराबर है। यह मोदी राज की तानाशाही का प्रमाण है, जहां जांच एजेंसियां लोकतंत्र की बजाय भाजपा की सेवा कर रही हैं।

नायक ने कहा कि भारत एक संघीय लोकतंत्र है, जहां केंद्र और राज्यों का संतुलन लोकतंत्र की जान है। जबकि, मोदी शासन में राज्यपाल, जांच एजेंसियां और ऑपरेशन लोट्स जैसी रणनीतियां संघीय ढांचे को ध्वस्त कर रही हैं। कहा कि राजनीतिक इतिहास बताता है कि सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन मोदी राज में यह जनादेश की भावना से इतर एक क्रूर खेल बन गया है, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य को जहर दे रहा है। वर्ष 2014 में मोदी सत्ता में आयी।

उसके बाद केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका राजनीतिक हथियार बन गई। ईडी के आंकड़े चीख-चीखकर कहते हैं कि वर्ष 2004 से 2014 में मात्र 112 मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज हुए, जबकि वर्ष 2014 से 2024 के बीच यह संख्या 5000 से ज्यादा हो गई। खासकर ज्यादातर विपक्षी नेताओं पर। सीबीआई को विपक्ष ने पिंजरे का तोता कहा, जो सुप्रीम कोर्ट की वर्ष 2013 की टिप्पणी थी, लेकिन मोदी राज में यह और भी सत्य साबित हुआ। कई विपक्षी शासित राज्य जैसे पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पंजाब ने सीबीआई की सामान्य सहमति वापस ले ली, जो मोदी सरकार के प्रति बढ़ते अविश्वास का प्रमाण है।

कहा कि आज सवाल दल से ऊपर है कि क्या मोदी शासन में भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता का विश्वास बचा पा रही हैं? जनादेश को ऑपरेशन लोट्स, दलबदल और संस्थागत दुरुपयोग से कुचला जा रहा है, जिससे लोकतंत्र की विश्वसनीयता संकट में है। भारत का संविधान जनता की आकांक्षाओं का प्रतीक है, लेकिन मोदी राज में इसे सत्ता की भेंट चढ़ाया जा रहा है। लोकतंत्र तभी बचेगा जब सभी दल संविधान की मर्यादा का सम्मान करें, लेकिन भाजपा की तानाशाही से यह खतरे में है। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वस्थ होनी चाहिए, जनता की आवाज ही अंतिम सत्य है और वही मोदी राज की साजिशों को पराजित करेगी।

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