पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सो पग धोए-लक्ष्मणाचार्य
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर के श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम् दिव्यदेश पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने 23 जुलाई को सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है, जबकि संत सद्भाव में जीता है। यदि संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ, क्योंकि संतोष सबसे बड़ा धन है।
जगद्गुरु लक्ष्मणाचार्य यहां नौलखा मंदिर में पुरुषोत्तम मास में आयोजित श्रीमदभागवत कथा का भक्तो को रसास्वादन करा रहे थे।
उन्होंने कहा कि सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में अनेकानेक बाल लीलाएं कीं, जो वात्सल्य भाव के उपासकों के चित्त को अनायास ही आकर्षित करती है। स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि जो भक्तों के पापों का हरण कर लेते हैं, वही हरि हैं।
उन्होंने उद्धव – गोपी संवाद एवं उद्धव द्वारा गोपियों को अपना गुरु बनाने की कथा का भी श्रवण कराया। उन्होंने कहा कि मनुष्य स्वयं को भगवान बनाने के बजाय प्रभु का दास बनने का प्रयास करें, क्योंकि भक्ति भाव देख कर जब प्रभु में वात्सल्य जागता है तो वे सब कुछ छोड़ कर अपने भक्तरूपी संतान के पास दौड़े चले आते हैं।

उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है। जबकि संत सद्भाव में जीता है। यदि संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ। संतोष सबसे बड़ा धन है। लक्ष्मणाचार्य महाराज ने कहा कि महारास में भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आह्वान किया था।
महारास लीला द्वारा ही जीवात्मा परमात्मा का मिलन
जगद्गुरु लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि महारास लीला द्वारा ही जीवात्मा-परमात्मा का मिलन होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने 16 हजार कन्याओं से विवाह कर उनके साथ सुखमय जीवन बिताया। उन्होंने सुदामा चरित सुनाते हुए कहा कि सुदामा जितेंद्रिय एवं भगवान कृष्ण के परम मित्र थे। भिक्षा मांगकर अपने परिवार का पालन पोषण करते थे। गरीबी के बावजूद हमेशा भगवान के ध्यान में मग्न रहते। पत्नी सुशीला सुदामा से बार बार आग्रह करती कि आपके मित्र तो द्वारकाधीश हैं, उनसे जाकर मिलो।
शायद वह हमारी मदद कर दें। सुदामा पत्नी के कहने पर द्वारका पहुंचते हैं। जब द्वार पाल भगवान श्रीकृष्ण को बताते हैं कि सुदामा नाम का ब्राम्हण आया है। श्रीकृष्ण यह सुनकर नंगे पैर दौड़कर आते हैं और अपने मित्र को गले से लगा लेते हैं। उनकी दीन दशा देखकर कृष्ण के आंखों से अश्रुओं की धारा प्रवाहित होने लगती है। सिंघासन पर बैठाकर कृष्ण सुदामा के चरण धोते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रेमाश्रु से हीं मित्र सुदामा के चरणों को पखारने लगते हैं। उन्होंने कहा कि पानी परात को हाथ छूवो नाहीं, नैनन के जल से पग धोये। सभी पटरानियां सुदामा से आशीर्वाद लेती हैं। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा महाराज के मित्र मिलन की झांकी दृश्यों से श्रद्धालु बहुत ही भावुक हो गए। सुदामा जब विदा लेकर अपने स्थान लौटते हैं तो भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अपने यहां महल बना पाते हैं, लेकिन सुदामा अपनी फुस की बनी कुटिया में रहकर भगवान का सुमिरन करते हैं।
कथा सुनाते वक्त स्वामी महाराज ने बताया कि कभी भी मित्र के साथ धोखा नही करना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि भागवत कथा ही ऐसी कथा है, जिसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है। भगवान कृष्ण के समान कोई सहनशील नही है। क्रोध हमेशा मनुष्य के लिए कष्टकारी होता है।
इस अवसर पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ के साथ समाजसेवी लाल बाबू पटेल, दिलीप झा, संस्थान प्रबंधक नन्द कुमार, रतन कुमार कर्ण, फूल झा, निलीमा आदि श्रीकृष्ण एवं सुदामा का जय घोष कर आरती करते दिखे।
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