एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। अब राजनीति नहीं बल्कि नीतियों की निर्णायक जीत चाहिए। झारखंडी समाज की ऐतिहासिक पुकार है कि शीतकालीन सत्र में लंबित बिलों को तत्काल पारित कराए हेमंत सरकार।
आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने 3 दिसंबर को झारखंड के सीएम को ई मेल संदेश भेजकर कहा कि आगामी 5 दिसंबर से प्रारंभ होने वाला शीतकालीन सत्र केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान, अधिकार और भविष्य की निर्णायक परीक्षा है।
उन्होंने मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष को भेजे पत्र में कहा कि वर्षों से लंबित झारखंडी हितों से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतियों पर तत्काल कार्रवाई अनिवार्य है, क्योंकि अब देरी, अन्याय के समान है। नायक ने कहा कि यह सत्र झारखंड के अस्तित्व की लड़ाई है। इतने वर्षों से लंबित मुद्दों पर अब और प्रतीक्षा झारखंडी जनता के अधिकारों पर प्रहार है। कहा कि सरकार और सदन को इस बार इतिहास रचना होगा। उन्होंने 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति/नियोजन नीति को झारखंडी युवाओं की पहचान, रोजगार और सामाजिक न्याय से जुड़ा सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा बताते हुए कहा कि इसे पुनः विधानसभा से पारित कर केंद्र के समक्ष मजबूत रूप में रखा जाना नितांत आवश्यक है।
नायक ने कहा कि न्यायालयों और सरकारी संस्थानों में झारखंडी भाषाओं को आधिकारिक दर्जा देने पर तत्काल निर्णय होना चाहिए, ताकि स्थानीय जनता को प्रशासन और न्याय तक सहज पहुंच मिल सके। उन्होंने भूमि संबंधी विवादों, दलाली और अवैध ट्रांसफर रोकने के लिए शक्तिशाली झारखंड भूमि सुधार आयोग के गठन की भी मांग की। साथ ही कहा कि सरना धर्म कोड को पुनः विधानसभा से पारित कर केंद्र को भेजना अत्यंत जरूरी है, ताकि आदिवासी समुदाय को जनगणना में उनका पृथक धर्म कोड मिल सके।

नायक ने संविदा, पारा, आंगनबाड़ी, होमगार्ड समेत अन्य कर्मचारियों के लिए स्थायी सेवा-नियमावली को लाखों गरीब परिवारों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बताया। कहा कि इस पर और विलंब अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि पेसा कानून बना तो है, पर गांवों में इसका क्रियान्वयन नगण्य है। ग्रामसभा की सर्वोच्चता बहाल किए बिना झारखंड की आत्मा को न्याय नहीं मिल सकता। उन्होंने पेसा के जमीनी स्तर पर लागू होने के लिए स्पष्ट और कठोर नीति बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही जमीन, बैंक, भूमि सुरक्षा तंत्र और अवैध हस्तांतरण की समीक्षा को भी अत्यंत आवश्यक कदम बताया।
नायक ने सरकार से अपील करते हुए कहा की झारखंड की जनता अब घोषणाओं से नहीं, निर्णयों से न्याय चाहती है। यह सत्र केवल कैलेंडर की तारीख नहीं बल्कि यह झारखंडी समाज के भविष्य का फैसला है। कहा कि सरकार और विपक्ष दोनों को मिलकर इसे ऐतिहासिक सत्र बनाना होगा।
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