शिक्षा विभाग की लापरवाहियों का लाभ उठाते स्कूल संचालक
40 और 60 सीटों के क्लास रूम में बैठाते हैं 70-80 छात्र
मुंबई। हाल के दिनों प्राइमरी और प्री प्राइमरी स्कूलों (Pri Primary Schools) में एडमिशन को लेकर चल रही गहमा-गहमी में अधिकांश अभिभावक परेशान हैं। वहीं स्कूल वालों की चांदी हो गई है। पहले फार्म बेचकर कमाया और अब एडमिशन के नाम पर किसी न किसी तरह कमा रहे हैं। वहीं महाराष्ट्र का शिक्षा विभाग (Maharashtra Department of Education) पंगू बना बैठा है। वहीं स्कूल संचालक विभाग की दुहाई देकर अभिभावकों को लूट रहे हैं। ऐसे में शिक्षा मंत्री के दावों के विपरीत चलने वाले स्कूलों पर कब होगी कार्रवाई?
मिली जानकरी के अनुसार मौजूदा समय में अधिकांश स्कूल संचालकों द्वारा खुद की प्री प्राईमरी स्कूल चलाया जा रहा है। और अपनी प्री प्राइमरी के छात्रों को प्राईमरी यानी जूनियर केजी में एडमिशन भी दिया जाता है। ऐसे में अन्य दूसरे बच्चों का क्या होगा? बता दें कि मुंबई के अधिकांश स्कूलों में 60 से 100 सीटों के लिए कम से कम एक हजार फार्म बेचा जाता है। इनमें ऑन लाईन और ऑफ लाईन दोनों का समावेश है। यहां के स्कूलों द्वारा फार्म के नाम पर पहली कमाई होती है।
इस दौरान अगर कोई अभिभावक एडमिशन से सबंधित जानकारी के लिए स्कूल में आता है तो उसे साफ तौर पर यह कहा जाता है कि महाराष्ट्र शिक्षा विभाग द्वारा सारा कुछ ऑन लाईन किया जा चुका है। लिहाजा आप ऑन लाईन जानकारी ले सकते हैं। यहां सवाल यह उठता है कि अगर स्कूल के पास 100 सीटें हैं तो हजारों फार्म बेचने का मतलब साफ है कि कहीं न कहीं अभिभावकों को ठगा जा रही है। क्योंकि फार्म लेने वाले अधिकांश अभिभावकों को उम्मीद बंध जाती है। लेकिन ऐसा नहीं होता स्कूल प्रबंधन द्वारा अधिक से अधिक फार्म बेचने की कोशिश की जाती है। ताकि इससे भी कमाई हो सके।
बहरहाल फार्म भरने के बाद उक्त फार्म में ढेरों खामियां निकाल कर उसे रिजेक्ट कर दिया जाता है। मिसाल के तौर पर बच्चों की जन्म तिथि, उसका कद, उसकी क्षमता और उसके माता पिता की शैक्षणिक शिक्षा कहां तक है। इसके बाद बच्चों का इंटरव्यू लिया जाता है। इंटरव्यू के बाद उसे 15 – 20 दिन या एक माह बाद बुलाया जाता है। इस अवधि में अभिभावक पूरी तरह टेंशन में रहते हैं कि न जाने प्रिसिंपल क्या जवाब देंगी।
स्कूलों के नखरेः
जब से महाराष्ट्र शिक्षा विभाग द्वारा ऑन लाईन एडमिशन की प्रक्रिया शुरू की गई है, तभी से स्कूल संचालकों को बहाना मिल गया है कि मेरे पास कुछ भी नहीं नहीं है। विभाग द्वारा जो भी आदेश आता है हमें उसका पालन करना होता है। ऐसे में हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। इसके अलावा चेंबूर के विभिन्न स्कूलों में जूनियर केजी के एडमिशन के दौरान यह भी कहा जाता है कि लड़कों की सीटें फुल हो गई है, लड़कियों के लिए दो तीन सीटे हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि राज्य एवं केंद्र सरकार लड़का -लड़की को समान करने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है। वहीं स्कूलों द्वारा लड़का -लड़की कर अभिभावकों को टेंशन दिया जाता है। ऐसे में आधे से अधिक बच्चे की उम्र को लेकर फार्म को रिजेक्ट कर दिया जाता है। जबकि इस विषय को फार्म भरने कि प्रक्रिया के समय देख लेना चाहिए। इस प्रकार स्कूल प्रबंधन द्वारा अभिभावकों को तरह- तरह से प्रताड़ित भी किया जाता है। जिसे अभिभावक खामोशी से बर्दाश्त कर लेते हैं क्योंकि उन्हें बच्चों के एडमिशन की उम्मीद रहती है।
गौरतलब है कि मुंबई सहित उपनगरों के अधिकांश स्कूल वाले सरकारी आदेशों के विपरीत ही चलते हैं। मिसाल के तौर पर एक क्लास रूम की लंबाई और चौड़ाई कितनी होनी चाहिए व उसमें कितने छात्रों को बैठाया जा सकता है। लेकिन इन स्कूलों में भेड़ बकरियों की तरह बच्चों को ठुंस दिया जाता है। ऐसे में बच्चे कैसे बैठेंगे और क्या पढ़ेंगे? इसके अलावा फायर फाइटिंग सिस्टम है या नहीं, सीसीटीवी कैमरे लगे हैं या नहीं आदि कई अन्य सवाल हैं। जिसकी अनदेखी कर यहां के स्कूलों को संचालित किया जाता है। वहीं महाराष्ट्र शिक्षा विभाग के अधिकारी पंगू बने बैठे हैं।
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