बीपीसीएल को कौड़ियों के भाव क्यों बेच रही सरकार
मुश्ताक खान/ मुंबई। करीब दो लाख करोड़ की बीपीसीएल (BPCL) को महज 68 हजार करोड़ में बेचने के खिलाफ मुंबई रिफाईनरी और इसके सेल्स विभाग द्वारा करीब 7 यूनियनों के संयुक्त नेतृत्व में कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन व आंदोलन किया। गुरुवार सुबह 8 बजे से माहुल स्थित बीपीसीएल मेन गेट से लेकर चेंबूर स्टेशन (Chembur Station) व डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर उद्यान तक सरकार की इस नीति के विरोध में कर्मचारियों ने नारेबाजी की। इनमें बीपीसीएल की महिला पुरूष कर्मचारियों के अलावा ठेका कंपनियों के कर्मचारी भी शामिल थे।
करोड़ों का माल कौड़ियों के भाव भाजपा सरकार द्वारा बेचने के विरोध में उतरी कर्मचारियों की यूनियन ने माहुल स्थित बीपीसीएल के मेन गेट से लेकर चेंबूर स्टेशन व डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर उद्यान तक सरकार की नीतियों के विरोध में जोरदार आंदोलन किया। इस आंदोलन में मुंबई बीपीसीएल और सेल्स विभाग के करीब दो से ढाई हजार महिला व पुरूष कर्मचारियों के अलावा ठेका कंपनियों के कर्मचारी भी शामिल थे। सुनियोजित कार्यक्रम के तहत बीपीसीएल के मुंबई रिफाइनरी (BPCL Mumbai refinery), कोच्चिन के कोच्ची रिफाइनरी, मध्यप्रदेश के बीना रिफाईनरी और असम के नुमालीगढ़ रिफाईनरी के कर्मचारियों व पदाधिकारियों ने भी आंदोलन किया।
आंदोलनकारियों का आरोप
प्रदर्शनकारियों का कहना है की देश का गौरव कहलाने वाली नवरत्न से सम्मानित भारत पेट्रोलियम एंड केमिकल्स लिमिटेड का निजीकरण होने से यहां के कर्मचारियों सहित इससे जुड़े लोगों को भारी नुकसान होगा। इससे बेरोजगारी की समस्याएं भी बढ़ेगी। चूंकि बीपीसीएल ने देश के कई गांव को गोद ले रखा है। इसके अलावा मच्छीमारों को बीपीसीएल द्वारा मिलने वाली सुविधाएं भी समाप्त हो जाएंगी। प्रदर्शनकारियों का कहना है की इससे जुड़ी विभिन्न प्रकार की सब्सिडी आदि भी खत्म कर दिया जाएगा। मुंबई रिफाइनरी व मार्केटिंग डिवीज़न (वेस्टर्न रीजन) द्वारा सुनियोजित ढंग से इस आंदोलन को कानून के दायरे में रह कर किया गया है।
गौरतलब है कि 1955 से चल रही वर्मा सेल नामक विदेशी कंपनी को कांग्रेस पार्टी के दौर में 1976 में राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। क्योंकि 1971 में बांग्लादेश से युद्ध के दौरान विदेशी कंपनी वर्मा सेल ने वायू सेना को ईंधन देने से इंकार कर दिया था। इसे देखते हुए कांग्रेस पार्टी की इंदिरा गांधी सरकार ने संवैधानिक रूप से विदेशी कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसके बाद बीपीसीएल बना था।
जिसे भाजपा की अटल सरकार ने निजीकरण की ओर फिर से लाने की कोशिश की लेकिन सांसद में नाकाम होने के बाद निजीकरण का मुद्दा खटाई में पड़ गया। अब उस मुद्दे को मोदी की भाजपा सरकार ने फिर से उठाया है। जिसका नतीजा देश की जनता को बेरोजगारी के रूप में भुगतना पड़ सकता है। बीपीसीएल वर्कर्स यूनियन के संदीप उनकुले, किशोर नायर, श्रीपत चौकेकर, वेणु बर्वे और साधना धारकर आदि का कहना है की पिछले तीन वर्षों में बीपीसीएल ने 13,500 करोड़ रूपये का मुनाफा कमाया है।
इसके अलावा 1999 में कारगिल युद्ध में भी बहुराष्ट्रीय एवं नवरत्न से सम्मानित बीपीसीएल देश के जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले। इसके बावजूद इसे निजीकरण करने की नौबत कैसे आई?
श्रीपत चौकेकर का कहना है की करीब दो लाख करोड़ की बीपीसीएल की संपत्ती को महज 68 हजार करोड़ में बेचने की वजह क्या है? इस तरह के सवालों का जवाब मौजूदा सरकार के पास नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया है की दिनों दिन देश की बिगड़ी हालत का कारण क्या है?
वहीं यूनियन के नेता किशोर नायर का कहना है की बीपीसीएल की चारों विंगों को मिलाकर करीब 12,600 अधिकारी एवं कर्मचारी कार्यरत हैं। इसके अलावा ठेका कंपनियों के हजारों लोग इससे जुड़े हैं। उन्होंने शंका जताई है की अगर बपीसीएल का निजीकरण हुआ तो इससे लाखों लोग बेरोजगार व प्रभावित होंगे।
वहीं यूनियन के संदीप उनकुले ने सरकार द्वारा निजीकरण के मुद्दे पर कहना है की वर्षो से मुनाफे में चल रही बीपीसीएल का निजीकरण करना यानी देश की बहूराष्ट्रीय संपत्ती में सेंध लगाने जैसा है। बहरहाल सुनियोजित आंदोलन कार्यक्रम में करीब दो से ढाई हजार महिला व पुरूष कर्मचारियों ने हिस्सा लिया। यह आंदेलन देश में स्थित बीपीसीएल की आन्य शाखाओं में भी किया गया। जबकि कोच्चिन के कोच्ची रिफाइनरी में पिछले 50 दिनों से लगातार धरना प्रदर्शन जारी है।
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