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उम्रकैद की सजा से मुक्त हुआ ऐसिड अटैकर




साभार/ मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसिड अटैक केस में दोषी शख्स को उम्रकैद की सजा से मुक्त कर दिया है। दोषी व्यक्ति और पीड़िता शादी कर चुके हैं। यही नहीं अब अटैकर पीड़िता की प्लास्टिक सर्जरी के लिए अपनी स्किन दान करना चाहता है। दोषी अनिल पाटिल ने कहा कि परस्पर सहमति से दोनों के बीच सुलह हो गई है और अब वह एक शांतिपूर्ण जिंदगी जीना चाहते हैं।

अनिल ने यह भी कहा कि वह पीड़िता की प्लास्टिक सर्जरी के लिए भुगतान भी करेंगे। दरअसल दिसंबर 2013 में खेड़ सेशन कोर्ट ने धारा 326 के तहत ऐसिड उड़ेलने के जुर्म में अनिल पाटिल को दोषी करार दिया था। इसी के साथ उसे उम्रकैद की सजा और 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। इसके बाद अनिल ने हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती दी, जहां उन्होंने इसे ‘पूर्ण रूप से असंगत सजा’ करार दिया। हालांकि उसने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी।

हाई कोर्ट में जस्टिस भूषण गवई और सारंग कोटवाल की बेंच ने 27 जून को दोषी व्यक्ति के समर्थन में आकर कहा कि 8 साल की सजा मामले के तथ्य को देखते हुए पर्याप्त से ज्यादा है और जिसे वह पहले ही भोग चुका है। कोर्ट ने कहा, ‘यह घटना आरोपी और पीड़िता के बीच अफेयर का नतीजा मालूम होती है।’
कोर्ट ने कहा, ‘दोनों लंबे समय से एक-दूसरे को जानते थे। जब अनिल ने प्रपोज किया तो पीड़िता ने मना कर दिया। ऐसे लगता है कि गुस्से में आकर अनिल ने पीड़िता को पहले धमकी दी और फिर 2010 में अप्रैल महीने में जब वह एक कॉलेज स्टूडेंट थी और अपनी दो दोस्तों के साथ लेक्चर अटेंड करने जा रही थी तो अनिल ने उसके चेहरे और कंधे पर तेजाब फेंक दिया।

पीड़िता की सहेलियां इस भयानक हादसे की गवाह थीं जिन्होंने बाद में इसकी पुष्टि की, इसी के तहत दोष सिद्ध हुआ। हाई कोर्ट ने भी दोषी करार देने के फैसले को गलत नहीं कहा लेकिन हाई कोर्ट ने पुलिस को यह जांचने के लिए कहा कि क्या हमलावर और पीड़िता एक साल पहले शादी कर चुके हैं जो कि जांच के बाद यह स्पष्ट हो गया।

हाई कोर्ट ने कहा, ‘शादी के बाद विक्टिम को इलाज के लिए प्लास्टिक सर्जन की जरूरत है जिसके लिए अपीलकर्ता ने स्किन दान करने को कहा है। हमने पाया कि अपीलकर्ता और विक्टिम ने शांतिपूर्ण रहने का फैसला किया है.. इसलिए यह जरूरी है कि अपीलकर्ता और विक्टिम को एक साथ शांतिपूर्ण जिंदगी जीने की अनुमति दी जाए।’ इस तरह हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि के फैसले को जारी रखा लेकिन हमलावर की सजा कम कर दी जिसे वह पहले ही भोग चुका है।

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