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आदिवासियों की बदतर हालत का जिम्मेवार कौन?

वृक्ष के नीचे रात गुजारने को मजबूर रीतनी मंझियाइन

एस.पी.सक्सेना/ बोकारो। हर इंसान का एक सपना होता है। उसका अपना घर हो, सर पर छत हो ताकि वह अपने परिवार के साथ रूखी-सुखी खाकर फांककशीं में ही गुजर बसर कर सके। अपनों द्वारा ठुकराये बोकारो जिला के हद में खुंटरी निवासी रीतनी मंझीयाइन की ऐसी किस्मत कहाँ।

महज पचास वर्ष की उम्र में ही रीतनी जीवन के चौथे व अंतिम पड़ाव में पहुँच गयी जान पड़ती है। और तो और वह सर पर छत के बिना एक वृक्ष के नीचे जीवन गुजर बसर करने को मजबूर है। लोगो के घरों से मांगकर उसे जो भी मिला उसे उसी वृक्ष के तले लकड़ी की अग्नि के सहारे वह भोजन बनाकर खा लेती है।
रीतनी की कहानी भी अजब है। न तो वह हिंदी और न ही खोरठा (झारखंड का प्रचलित भाषा) ही बोल या समझ पाती है। जिसके कारण वह अपनी वास्तविक स्थिति को लोगो को बयां कर सके।

बार बार पूछे जाने पर टूटी फूटी भाषा में उसने अपना नाम रीतनी मंझियाइन बताती है। इशारो से वह अपना घर बोकारो-बेरमो पथ पर खुंटरी टुपकाडीह बताती है तथा परिजनों द्वारा घर से निकाले जाने की बात स्वीकारती है। राजकीय पॉलिटेक्निक खुंटरी के समीप के एक शीशम के वृक्ष के नीचे मूली आदि के पत्ता पका रही रीतनी के अनुसार उसे सरकार या शासन द्वारा अब तक कोई सहयोग नही मिला है। ऐसे में उक्त वृक्ष की पत्ती व तना ही उसका घरौंदा है।

प्रचंड ठंढ के मौसम में रीतनी जीवन से कितना संघर्ष कर पाती है यह यक्ष प्रश्न है। गत् 21 दिसंबर को उक्त मार्ग से गुजर रहे बोकारो थर्मल निवासी बिनोद कुमार शर्मा, कथारा निवासी योगेन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव, बोडिया वस्ती निवासी शिवनाथ यादव आदि ने उसकी दयनीय हालत को देखकर उसे आर्थिक मदद की। क्या इसी प्रकार की मदद केंद्र व् झारखंड की सरकार उसे करेगी? यह तो भविष्य के गर्त में है।

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