एस.पी.सक्सेना/ बोकारो। एकीकृत बिहार-झारखंड के परोंधा, झारखंड राजनीति के चाणक्य, मजदूरों के मसीहा और अन्य अनेकों अलंकारों से अलंकृत बिहार-झारखंड के पूर्व मंत्री एवं बेरमो (Bermo) के विधायक राजेंद्र प्रसाद सिंह (Rajendra Prasad Singh) बेरमो की जनता को बिलखता छोड़ कर चले गये उस अदृश्य मार्ग पर जहां से किसी की वापसी संभव नहीं है।
नियम के पक्के तथा सबको अपने वश में कर लेने की कला में माहिर राजेंद्र प्रसाद सिंह का आगाज बेरमो की राजनीति में तब हुआ था जब वर्ष 1984 की राजाबेड़ा (भंडारीदह तथा चन्द्रपुरा के बीच में स्थित जगह) की आमसभा में तब के कोयला मजदूरों के मसीहा व केंद्रीय मंत्री स्व.विन्देश्वरी दुबे ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित करते हुये स्वयं बेरमो से चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा कर दी। तथा स्व दुबे बिहार के बक्सर से चुनाव लड़कर बिहार के मुख्यमंत्री बने थे।
वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में पहली बार बेरमो विधानसभा से कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह का सामना तब के सिद्धहस्त वाम नेता तथा मजदूर आन्दोलनकारी कॉ शफीक खान तथा समाजवादी नेता शंकर सिंह से था। राजेंद्र बाबू ने तब सबको पीछे छोड़ चुनावी जीत दर्ज कर ली। सबसे बड़ी बात कि राजेंद्र प्रसाद सिंह तब भी और कालांतर में भी अपनी राजनीतिक कला की बदौलत सबके प्रिय बने रहे हैं। उनके चीर परिचित प्रतिद्वंदी व दो बार बेरमो विधानसभा से प्रतिनिधित्व कर चुके योगेश्वर महतो बाटुल भी उनका लोहा मान गये है।
विधायक राजेंद्र प्रसाद सिंह की मृत्यू ने बेरमो वासियों को स्तब्ध कर दिया है। उनकी मृत्यू के पश्चात 26 मई की सुबह से ही उनके पार्थिव शरीर के दर्शनों के लिए लोगों का तांता लगा रहा। क्या राजनीतक दल के नेता, समाजसेवक, विधायक, मंत्री, संतरी, प्रशासनिक अमला, विद्यालयों के शैक्षणिक कर्मी, छात्र, मजदूर, किसान सभी की आंखे नम था। लोग बाग स्वयं को ठगा महसूस कर रहे थे और वह सबको रोता बिलखता चल दिया एक अदृश्य मार्ग पर। शायद ही झारखंड राज्य को और कांग्रेस पार्टी को अब ऐसा सपूत मिल पायेगा जिसे लोग भुला नहीं सकेगा। विधायक राजेंद्र प्रसाद सिंह इस पृथ्वी लोक को त्याग दिये लेकिन उनकी कृति दशको तक भूलना असंभव होगा।
759 total views, 1 views today