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बीए एमए बानी छोट काम करब त लोगवा का कही

एस.पी.सक्सेना/ बोकारो। समाज में पढ़े लिखे खासकर उच्च शिक्षा प्राप्त अधिकतर लोग बेरोजगार हैं। बेरोजगारी उनकी सोंच में है। उनके मन में केवल एक ही हीनता की भावना ने अड्डा जमा लिया है कि वे उच्च शिक्षा प्राप्त हैं छोटा काम करेंगे तो लोग क्या कहेगा। इसी विषय पर आधारित है बोकारो (Bokaro) जिला के हद में बेरमो प्रखंड गायत्री कॉलोनी (Gayatri Colony) निवासी प्रिंस बैजनाथ प्रसाद का यह लेख:-

किस्सा एक ऐसे बिहारी का है जो स्वयं को थोड़ा में “हम” पाल बैठता है। किसी भी काम को करने में अपनी योग्यता का भ्रम पाले है कि मैं अमुल काम करुँ या न करुँ?

नवयुवक जिसके पिता ने कड़ी मेहनत से उसे बीए-एमए तक पढ़ाया। शिक्षा पाने के बाद युवक गांव आकर अपनी उच्च शिक्षा के अनुरुप नौकरी के लिए कई जगहों में आवेदन करता है। नौकरी उसे नहीं मिलता है और उसका उम्र भी बढ़ता जाता है। इस बीच अचानक एक दिन उसके पिता जो पेशे से किसान हैं बेटे से कहते हैं कि ‘बाबू खेत में बनिहार (खेतिहर मजदूर) सब खेत जोततारण। बेचारा धुप में पियासल होयिहें। एक बाल्टी पानी ले के सब-के पानी पीआ आबअ। पिता की बात सुन पुत्र भड़क गया और बोला-बाबूजी तोहरा समझ नईखे कि हम एतना पढाई कईनी बनिहार के पानी पिलावे खातिर। लोगवा का कही?

कुछ अंतराल बाद उसका उम्र बढ़ता देख उसका विवाह करा दिया जाता है। तत्पश्चात वह भी पिता बन जाता है। तब उसके पिता कहते हैं ‘बाबू अब तू एक से दु के बाद तीन हो गईलअ। नौकरी मिलल नईखे। छोटा-मोटा रोजगार कर लअ। न होखे तअ पान के गुमटी खोल लअ। एही से तोहार मन भी लागी आउर दु पैसा आमदनी भी हो जाई।’ लड़का पुन:भड़ककर पिता से कहता है “बाबूजी आप उमर के साथ सठिया गाईनी। एतना पढाई कर के पान के गुमटी खोलीं। लोगवा का कही”? अन्ततः वह अपने जीवन में कुछ नहीं कर पाता है और लोगवा का कही के भ्रमजाल में उलझा रहता है। यही है खासकर बिहारी मानसिकता में फंसा बेरोजगारी का स्वरुप।

दुसरी ओर एक पढा लिखा उच्च शिक्षा प्राप्त सिक्ख पंजाबी युवक भूखा प्यासा अपने गांव से किसी तरह से शहर आता है। भूखा प्यासा होने के बावजूद किसी से भिख न माँगकर खाने के बजाय शहर में स्थित एक गुरुद्वारा पहुंचता है। गुरुद्वारा के ज्ञानी महाराज से कहता है कि वह गांव से आया है। उसके पास कोई काम भी नहीं है और वह भूखा प्यासा भी है। उसे कोई काम दे ताकि वह अपनी जीविका चला सके। ज्ञानी महाराज उसे गुरुद्वारा की साफ-सफाई व बागवानी के काम में लगा देता है और उसके रहने खाने-पीने का इन्तजाम कर देते हैं।

कुछ दिन बाद उक्त गुरुद्वारे में सिक्ख समुदाय की गोष्ठी होती है जिसमें ज्ञानी जी द्वारा उक्त सरदार युवक का जिक्र कर विचार करने का आग्रह किया जाता है। गोष्ठी में उपस्थित सभी सरदार एक एक रूपया इकट्ठा कर उस सरदार युवक को कुल सौ रुपये दिया गया। जिसमें वह 25 रूपये का चना लेकर रात्रि मे उसे फुलाकर सुबह में पास के स्कूल के बाहर जाकर बेचता है। साथ ही वह गुरुद्वारा के काम को भी करता रहता है। सामानों की बिक्री के बाद प्राप्त लाभ को वह अपनी पूंजी बढाकर अन्य सामान भी बेचने लगता है। इस प्रकार वह आगे चलकर ट्रक का मालिक बनकर एक अच्छा व् सफल व्यवसायी साबित होता है।

कहने का सार यह कि काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता है। हम इसे लोगवा का कही की भावना से न जोड़कर अपना कर्तब्य समझकर करेंगे तभी हमारे साथ-साथ समाज और देश की उन्नति होगी। न कोई बेरोजगार रहेगा। सर्वत्र खुशहाली होगा। यही सच्ची देशभक्ति होगी।

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