खंडहर किलों को संवारने की कवायद में राज परिवार
धनंजय प्रताप सिंह (गोपालगंज)। करीब एक शतक बाद फिर से हथुआ राज (Hathwa Raj) के धरोहर गुलजार होंगे। रोजगार के अवसर बनेंगे। सरकार के बजाय राज शाही द्वारा हथुआ को पर्यटन स्थाल बनाने का काम युद्ध स्तर पर किया जा रहा है। जबकि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारें करोड़ो रूपये खर्च करतीं हैं। इसके बाद भी पर्यटकों को रिझाने में नाकाम हैं। काश मौजूदा सरकार हथुआ राज के धरोहरों पर एक नजर डालती तो यहां का सबेय हवाई अड्डा कब का तैयार हो गया होता। इससे भी पयर्टन को काफी बढ़ावा मिलता है। पर्यटन को बढ़ावा देने से रोजगार के अवसर खुद ब खुद पैदा होते हैं।
हथुआ राज के पैलेस (Hathwa Raj Palace) इंचार्ज एस एन शाही (S N Sahi) के अनुसार इस संग्रहालय की खासियत यह होगी कि इसमें पब्लिक टॉय ट्रेन, हथुआ राज के सभी महाराजाओं की सिलिकॉन के बनी जीवन पर मूर्तियां, पुराने ऐतिहासिक फोटो, हथुआ राज से जुड़े इतिहास, महाराजाओं के राजसी पत्र तथा कई पुरातत्व पर्यटकों को देखने को मिलेंगे।
खंडहर होती हथुआ राज के कई पुरानी किलों को फिर से संवारने की कवायद शुरू हो गई है, इन किलों को राज के 100वें वंशज महाराजा छत्रधारी साही ने अपने राज काल के दौरान सन 1802 में बनवाये थे। संग्रहालय बनते ही पुरानी किला में टॉय ट्रेन दौड़ने लगेगी। पर्यटकों के लिए इतिहास से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां व यादें भी होंगी। इसके अलावा 21वीं सदी की तर्ज पर बहुत कुछ देखने व यादगार बनाने के लायक होगा। राज शाही परिवार का मकसद लोगों को रिझाना नहीं बल्कि हथुआ राज के वंशजों द्वारा देश के लिए समर्पण व इन धरोहरों से जुड़ी हकीकत से परिचित कराना है।
हथुआ राज के धरोहरों पर नक्काशी व इसे जोड़ने वाले राज मिस्त्री खुर्शीद अली का पौत्र जफर इमाम को पुरानी किला का जीर्णोद्धार के लिए चुना गया है। जफर इमाम फुलवरिया थाना क्षेत्र के चुरामन चक गांव के निवासी हैं। उनकी गिनती हथुआ राज के विश्वास पात्र लोगों में होती है। खुर्शीद अली का पौत्र जफर इमाम एवं बैकुंठपुर थाना क्षेत्र के देउकुली ग्राम निवासी संजय ठाकुर पुराने किला का जीर्णोधार एवं पुराने खूबसूरती लौटाने में लग गए हैं। बताया जाता है कि पुरानी किला से वर्ष 1954 में 54 घड़ा में खड़ी अशर्फी, सोना एवं चांदी का सिक्का मिला था। हथुआ के पुरानी किला में महाराजा छत्रधारी साही द्वारा तांबा एवं चांदी के आदम कद 54 बड़े घड़ा मे पिछले सैकड़ों वर्ष पुराने अशर्फी, सोना एवं चांदी के सिक्का तथा कई बहुमूल्य रत्न रखे थे।
जिसे 1954 तत्कालीन महाराजा गोपेश्वर प्रताप शाही (Maharaja Gopeshwar Pratap Sahi) को पुरानी किला में स्थित मंदिर के पुजारी ने बताया था। पुजारी के अनुसार वे पीढ़ी दर पीढ़ी सुनते आ रहे हैं कि हथुआ राज का पुरानी किला वस्तुत का लक्ष्मी घर है। तत्कालीन महाराजा गोपेश्वर प्रताप शाही ने अपने दीवान बीएन दत्त से पुरानी डायरी को मंगाकर अध्यन किये। जिसमें अकूत संपत्ति का वर्णन महाराजा कृष्ण प्रताप साही ने किया था। हालांकि उस वक़्त तत्कालीन महाराजा गोपेश्वर प्रताप शाही ने क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए महाराजा गोपेश्वर साही महाविद्यालय के लिए पुरानी किला को देने का मन बना चुके थे। लेकिन पुरानी किला से अकूत संपत्ति मिलने के बाद महाराजा गोपेश्वर प्रताप शाही ने अपनी नई किला के बगल में अवस्थित हाथी खाना कैंपस को महाविद्यालय बनवा दिया, जो अब भी सुचारू रूप से महाराजा मृगेंद्र प्रताप साही की देख- रेख में चल रहा है।
मौजूदा महाराजा मृगेंद्र प्रताप साही (Maharaja Mrigendra Pratap Sahi) ने जगत प्रहरी (Jagat Prahari) से बातचीत के दौरान बताया कि गोपालगंज (Gopalganj) जिले में पर्यटन की बड़ी संभावनाएं हैं। इससे हथुआ राज के लोगों को रोजगार भी मिलेगा। उन्होंने बताया कि धार्मिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों का जीर्णोद्धार एवं व्यवस्थित होते ही पुरानी किला में पर्यटकों के लिए म्यूजियम व हर आयु के लोगों के लिए टॉय ट्रेन भी चलेगी।
हस्ती ग्राम से कैसे बना हथुआ
इस मुलाकात में बातचीत के दौरान महाराजा मृगेंद्र प्रताप साही ने बताया कि हथुआ राज के 100वें वंशज महाराजा छत्रधारी साही ने अपने राज काल के दौरान पुरानी किला का निर्माण कराया, वे इसमें निवास भी किए। दरअसल महाराजा छत्रधारी साही महज 5 साल की उम्र में ही महाराजा बना दिए गए। लेकिन उनकी देखभाल व्यस्क होने तक सिवान जिला के भलुई निवासी धज्जी सिंह राजपूत ने किया। यहां यह बताना जरूरी की एशियन सोसाइटी ऑफ बंगाल जर्नल मे उल्लेखित है की हथुआ का नाम पहले हस्ती ग्राम था। जिसे महाराजा छत्रधारी साही के राज काल में हथुआ (Hathwa) का नामाकरण किया गया। धज्जी सिंह राजपूत महाराजा क्षत्रधारी साही के अभिभावक थे। बात काफी पुरानी है जिस समय महाराजा व्यस्क हुए तब इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए उन्हें मात्र 50,000 रूपये नगद दिए गए थे। सन 1854 के संथाल आंदोलन तथा सैनिक विद्रोह के समय भी महाराजा ने अहम भूमिका निभाई। हथुआ राज के सर्वाधिक लंबे शासनकाल निभाने वाले महाराजा की मृत्यु 16 मार्च 1857 को हुई।
महाराजा छत्रधारी साही संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे, उन्होंने मिथिला एवं बनारस से प्रकांड विद्वानों को बुलाकर संगीत विद्यालय कि स्थापना की। उस विद्यालय में देश विदेश के विद्यार्थी निशुल्क शिक्षा ग्रहण करने आते थे, जो अब भी छत्रधारी संस्कृत महाविद्यालय हथुआ गोपाल मंदिर परिसर में अवस्थित है। उपरोक्त संस्कृत विद्यालय की स्थापना महाराजा ने निरंजन स्वामी की देखरेख में हुई थी। जिसमें एक साथ 1000 विद्यार्थी निशुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे। समय के पाबंद एवं कुशल प्रशासक के रूप में राजपाट चलाने वाले महाराजा छत्र धारी साही अपने मृत्यु के वक़्त करीब 50,00000 रूपये नगद खजाने में छोड़ गए।
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