महायज्ञ में प्रभु श्रीराम के वन-गमन की मार्मिक प्रस्तुति
प्रहरी संवाददाता/पेटरवार (बोकारो)। अयोध्या के महाराज दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को राजा बनाना चाहते थे, पर देवताओं को लगा कि राम केवल अयोध्या के नहीं हैं। मंथरा और कैकेई को माध्यम बनाकर भगवान का बनवास हो गया। वन जाने की खबर सुनकर प्रभु श्रीराम प्रसन्न हो गये।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी से पधारी मानस कोकिला नीलम शास्त्री ने 11 मार्च की संध्या बोकारो जिला के हद में पेटरवार प्रखंड के अंगवाली में आयोजित श्रीरामचरित मानस की 29वें सम्मेलन में प्रवचन के दौरान उक्त उदगार व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जहां वर्तमान समय के नवयुवक माता,पिता की बात की अवहेलना कर केवल भौतिकता की चकाचौंध भरी जिंदगी गुजारना चाहते हैं। वहीं भगवान राम ने पिता की आज्ञा सिरोधार्य कर वन के कठिन मार्ग का चयन किया। कहा कि एसी युक्त बंगलें में रहकर एसी गाड़ी में चलकर हम प्रजा की समस्याओं को नहीं समझ सकते। इसके लिए पैदल चलकर गंगाजी के तट पर आना होगा। केवट को गले लगाना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जबतक समाज में अस्पृश्यता की भावना रहेगी, जातिवाद रहेगा तब तक रामराज का मतलब क्या?
उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम के इस क्रांतिकारी अभियान में छोटे भाई लक्ष्मण और प्रियतमा सीता जी ने प्रभु का साथ दे भारत वर्ष की जनता को यह बता दिया कि त्याग और तपस्या ही महान बनाता है। इस अवसर पर वाराणसी से पधारे मानस मार्तंड अच्युतानंद पाठक महराज ने सारगर्भित व्याख्यान किया, वहीं गिरिडीह से पधारे व्यास अनिल पाठक एवं समूह द्वारा मैथिली तर्ज पर कई भजन प्रस्तुत किया गया। संपूर्ण कार्यक्रम के दौरान पूरी यज्ञ कमिटी सक्रिय दिखी।
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