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हरिपुर के कोनहारा घाट में मशाने की होली का आयोजन

गंगोत्री प्रसाद सिंह/हाजीपुर (वैशाली)। वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर स्थित धर्मनगरी हरिहरक्षेत्र का हरिपुर जो गंगा और गंडक के संगम पर बसा है, के कोनहारा घाट श्मशान घाट पर 23 मार्च को मसाने की होली का भव्य आयोजन किया गया।

ज्ञात हो कि, हरिहर क्षेत्र हरी और हर दोनो की भूमि रही है। पौराणिक मान्यता है कि इसी स्थल पर गंडक नदी के तट पर नारायण अपने भक्त ग्राह की पुकार पर उसकी रक्षा के लिए अवतरित हुए और अपने भक्त ग्राह की रक्षा की। इस स्थान का नाम कौनहरा पड़ा।

गंडकी का दूसरा नाम नारायणी कहा जाता है। हरिपुर मंदिरों का शहर था, जिसके अवशेष हाजीपुर स्थित गंडक नदी के घाटो पर आज भी विद्यमान है। कौनहारा घाट पर ही श्मशान घाट है, जहां उत्तर बिहार के अधिकांश जन अंतिम संस्कार करने के लिए आते हैं।

बताया जाता है कि इस श्मशान घाट पर होली के अवसर पर चिता की राख से होली की परंपरा रही है। लेकिन, मुगलों के काल में हरिपुर का नाम हाजीपुर कर दिया गया। चिता की राख से होली की परंपरा खत्म हो गई।

इस वर्ष 2024 में हिंदू जागरण मंच के अध्यक्ष बिनोद कुमार यादव और हाजीपुर सोनपुर सम्पूर्ण हरिहर क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता और साधु संतो ने मसाने की होली की परंपरा को हरिपुर में पुनर्जीवित किया है। इसे लेकर 23 मार्च की संध्या में नारायणी की कोनहारा श्मशान घाट पर भव्य आरती की गई जहां सैकड़ो साधू संत और आमजन ने श्मशान की चिता की राख से होली खेली।

इस अवसर पर हाजीपुर के आसपास के किन्नर समाज द्वारा श्मशान में चिताओं की राख और रंग से होली खेली गयी। शमशान में चिताओं के सामने किन्नरों को होली खेलता देख आम रहिवासी आश्चर्य चकित रह गए। इस अवसर पर आयोजित रंगारंग कार्यक्रम में हजारों हरिपुर वासी सम्मिलित हुए।

हाजीपुर में पहली बार इस तरह से किन्नरों को होली मनाते देख सभी अचंभित थे। हालांकि, बनारस और प्रयागराज के घाट पर मसाने की होली का आयोजन किया जाता रहा है, लेकिन हाजीपुर में पहली बार ऐसा आयोजन किया गया है।

हरिपुर के पौराणिक महत्व को पुनर्स्थापित करने के लिए वर्षो से संघर्षरत हिन्दू जागरण मंच के अध्यक्ष विनोद यादव ने बताया कि सनातन धर्म के अनुसार श्मशान आदमी का असली घर होता है। यहां सबको एक दिन आना ही होता है। यहां आने के बाद मनुष्य सभी राग द्वेष को भुला देता है, इसलिए श्मशान की होली को शुभ माना जाता है।

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