स्वदेशी आंदोलन के प्रथम बलिदानी बाबू गेणू सैद का मनाया गया बलिदान दिवस
रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में, जब भारत अंग्रेज़ों की औपनिवेशिक हुकूमत के दमन से जूझ रहा था, तब बॉम्बे (तत्कालीन मुंबई) में एक सामान्य मजदूर ने अपनी वीरता, देशभक्ति और बलिदान से इतिहास को प्रेरित कर दिया। उनका नाम था बाबू गेनू। जिन्होंने स्वदेशी आंदोलन के तहत विदेशी वस्त्रों के आयात के खिलाफ आवाज उठाते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।
उपरोक्त कहना है स्वदेशी जागरण मंच के क्षेत्रीय संयोजक अमरेंद्र कुमार सिंह का। वे बोकारो के नया मोड़ स्थित बिरसा चौक में स्वदेशी जागरण मंच बोकारो द्वारा आयोजित स्वदेशी आंदोलन के प्रथम बलिदानी बाबू गेणू सैद के पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि बाबू गेनू का व्यक्तित्व भले ही चाटुकार इतिहासकारों के कारण इतिहास में विस्तृत रूप से दर्ज न हो, परन्तु उनका बलिदान उन्हें स्वदेशी आंदोलन का अमर प्रतीक बनाता है। उन्होंने न केवल ब्रिटिश आर्थिक उत्पीड़न के खिलाफ विरोध किया, बल्कि आम जनता को अपने देश के बने स्वदेशी वस्त्रों और स्वदेशी उत्पादों के प्रति जागरूक करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाबू गेनू का योगदान मुख्य रूप से विदेशी वस्त्रों के आयात विरोधी आंदोलनों में रहा।
मंच के सह प्रांत मेला सह प्रमुख अजय सिंह ने कहा कि ब्रिटिश शासन भारतीय उद्योगों को कमजोर करने के लिए विदेशी कपड़े भारत में लाता था। इसी आर्थिक शोषण के खिलाफ बाबू गेनू ने सक्रिय विरोध किया। कहा कि 12 दिसंबर 1930 को मुंबई में एक ऐतिहासिक घटना घटी। बाबू गेनू ने एक ऐसे लोरी को रोकने का प्रयास किया, जो विदेशी कपड़े बाॅम्बे के बंदरगाह से भारतीय बाजार में बिक्री के लिए जा रहे थे। उनके इस साहसिक प्रयास के दौरान ब्रिटिश पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी, गोली चलाई और लोरी से बाबू गेनू को रौंद दिया। इस प्रकार बाबू गेनू शहीद हो गए।
उनका यह बलिदान स्वदेशी आंदोलन के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। उन्होंने कहा कि बाबू गेनू के बलिदान को स्वदेशी जागरण मंच स्वदेशी दिवस के रूप में प्रतिवर्ष 12 दिसंबर को मनाया जाता है। इस दिन का महत्व केवल उनके शौर्य को याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में देशी उत्पादों के समर्थन और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार की भावना को भी उजागर करता है। उनकी शहादत ने मजदूर वर्ग, छात्रों और आम नागरिकों को प्रेरित किया कि वे अपने देश के आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए खड़े हों।
उन्होंने कहा कि बाबू गेनू का योगदान यह दिखाता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार तक सीमित नहीं थी, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। बाबू गेनू का नाम आज भी स्वदेशी आंदोलन और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है। उनके बलिदान ने यह संदेश दिया कि साहस और देशभक्ति से किसी भी औपनिवेशिक शक्ति का सामना किया जा सकता है।
मंच के प्रांत संपर्क प्रमुख अजय चौधरी दीपक ने कहा कि स्वदेशी दिवस पर उन्हें याद करना न केवल उनके शौर्य को सम्मानित करना है, बल्कि यह भारतीय समाज के लिए अपने उत्पादों और संसाधनों के महत्व को समझने का अवसर भी है। कहा कि बाबू गेनू की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि देशभक्ति के छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। उनके बलिदान का स्मरण हमें अपने समाज में स्वदेशी उत्पादों के प्रयोग और समर्थन के लिए प्रेरित करता है।
स्वदेशी जागरण मंच द्वारा स्वदेशी दिवस के अवसर पर नया मोड़ बिरसा चौक पर अमर शहीद बाबू गेनू को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम में क्षेत्रीय संयोजक अमरेन्द्र सिंह, मंच के प्रांत संपर्क प्रमुख अजय कुमार चौधरी, प्रांत के सह मेला प्रमुख अजय कुमार सिंह, जयशंकर प्रसाद, विनोद चौधरी, राकेश रंजन, नवीन कुमार सिंह, रजनीकांत कुमार सिंह, विवेकानंद झा, मनीष कुमार श्रीवास्तव, सुनीता श्रीवास्तव, पुष्पा मिश्रा, कुमार संजू, ए.के. सिंह, अमरिंदर सिंह, प्रेम प्रकाश, सुजीत कुमार समेत काफी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे।
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