अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में हरिहरक्षेत्र सोनपुर स्थित श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम् दिव्य देश (नौलखा मंदिर) में 26 सितंबर को श्रीवामन भगवान का प्राकट्योत्सव धूमधाम से मनाया गया। उक्त अवसर पर पीठाधिपति जगतगुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने आध्यात्मिक यात्रा हरिद्वार प्रवास से दूरभाष माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित करते श्रीवामन भगवान के कथा विस्तार से बताया।
लक्ष्मणाचार्य महाराज ने कहा कि सभी दुःखी देवता माता अदिति के पास पहुंचे और अपनी समस्या बताई। इसके बाद माता अदिति ने पति कश्यप ऋषि के कहने पर व्रत किया, जिसके शुभ फल से भगवान श्रीहरि विष्णु ने श्रीवामन भगवान के रूप में अवतार लिया। उन्होंने कहा कि छोटी उम्र में ही श्रीवामन भगवान ने दैत्यराज बलि को पराजित किया।
बलि अहंकारी था, उसे लगता था कि वह सबसे बड़ा दानी है। श्रीहरि विष्णु वामन भगवान के रूप में उसके पास पहुंचे और दान में तीन पग धरती मांगी। अहंकारी बलि ने सोचा कि ये तो छोटा सा काम है। मेरा तो पूरी धरती पर अधिकार है। मैं इसे तीन पग भूमि दान कर देता हूं। बलि वामन भगवान को तीन पग भूमि दान देने के लिए संकल्प कर रहे थे, उस समय दैत्यराज के गुरु शुक्राचार्य ने उसे रोकने की कोशिश की।
लक्ष्मणाचार्य महाराज ने कहा कि दरअसल, शुक्राचार्य जान गए कि वामन रूप में स्वयं श्रीहरि विष्णु हैं। भक्त प्रह्लाद का पौत्र बलि बड़ा ही घमंडी और महाभिमानी था, परन्तु बहुत बड़ा दानी भी था। उसने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी और दान देने के लिए संकल्प करने लगा। शुक्राचार्य छोटे रूप धारण कर जलप्रात्र कमण्डल के टोटी में आ गए जिससे संकल्प के लिए जल ही नहीं प्राप्त हो।
भगवान वामन समझ गए और एक पतली लकड़ी कुशा कमण्डल के टोटी में डाल दिया। जिससे शुक्राचार्य की आंख फुट गई। वे तुरंत कमण्डल से बाहर निकल आए। इसके बाद बलि ने वामन भगवान को तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया।
स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने बताया कि राजा बलि के संकल्प लेने के बाद वामन भगवान अपने विराट रूप में आकर एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग लोक नाप लिया। उन्होंने बलि से तीसरे पग को रखने की मांग की। राजा बलि का अहंकार टूट गया और अपने सिर पर तीसरे पग रखने की विनती कर उसने वामन भगवान को प्रसन्न किया। बलि की दान वीरता देखकर भगवान वामन उसे पाताल लोक का राजा बना दिया।

इस प्रकार सभी देवताओं ने इन्द्र के साथ खुशी से अपने अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हो गए। उक्त अवसर पर मन्दिर प्रबंधक नन्द कुमार बाबा ने कहा कि भगवान के अवतार और उनके द्वारा किए गए कार्य से हमारे जीवन प्रबन्धन की शिक्षाएं मिलती है।
उन्होंने कहा कि इस कहानी की सीख यह है कि जब कोई व्यक्ति अच्छा काम कर रहा हो तो उसे रोकना नहीं चाहिए। तभी तो कहानी में शुक्राचार्य राजा बलि को दान करने से रोका और अपनी एक आंख गंवा दिया। इस प्रकार जब जब हम किसी को अच्छे काम करने से रोकते हैं तो हमारी परेशानियां बढ़ती है।
इस अवसर पर मन्दिर मीडिया प्रभारी समाजसेवी लाल बाबू पटेल ने सभी श्रद्धालुओं को सेवा व्यवस्था देते हुए महाप्रसाद वितरण किया। इस कार्य में राजीव नयन सिंह, सत्येन्द्र सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वनाथ सिंह, अधिवक्ता अभय कुमार सिंह, गंगाजली देवी, संजू सिंह सहित दर्जनों श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक भाग लिया।
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