एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। आतंकियों द्वारा जम्मू एवं कश्मीर के पहलगाम में बीते 22 अप्रैल को पर्यटकों की हत्या केंद्र सरकार और खुफिया तंत्र की घोर लापरवाही और विफलता का परिणाम है। यह हमला कश्मीर की आत्मा के साथ साथ प्रत्यक्ष रूप से देश पर हमला है, जो बर्दाश्त योग्य नहीं है।
उपरोक्त बाते 23 अप्रैल को जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले, जिसमें 26 पर्यटकों और दो स्थानीय रहिवासियों की निर्मम हत्या होने पर आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष सह पूर्व विधायक प्रत्याशी विजय शंकर नायक ने कही।
उन्होंने m कहा कि इस हत्याकांड ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। यह हमला न केवल कश्मीर की शांति और पर्यटन को बढ़ावा देने के दावों पर कड़ा प्रहार है, बल्कि केंद्र सरकार और खुफिया एजेंसियों की घोर लापरवाही और विफलता को भी उजागर करता है। इस जघन्य कृत्य की वे कड़े शब्दों में निंदा करते हैं और केंद्र सरकार को इस गंभीर सुरक्षा चूक के लिए जवाबदेह ठहराते हैं।
केंद्र और खुफिया तंत्र की लापरवाही खुफिया विफलता
नायक ने कहा कि यह हमला केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा जम्मू और कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा के मात्र दो सप्ताह बाद किया गया। इतने बड़े पैमाने पर आतंकी हमले की कोई पूर्व सूचना न मिलना खुफिया एजेंसियों की अक्षमता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) जैसे संगठन इस खतरे को भाँपने में पूरी तरह विफल रहे? सुरक्षा व्यवस्था की कमी पहलगाम जैसे लोकप्रिय पर्यटक स्थल, जो प्रतिदिन सैकड़ों पर्यटकों को आकर्षित करता है में सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर थी कि 2-3 आतंकियों ने बिना किसी रुकावट के हमला कर दिया।
चप्पे-चप्पे पर सैनिक और अर्धसैनिक बलों की तैनाती के दावे खोखले साबित हुए। उन्होंने कहा कि जम्मू और कश्मीर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफ्सपा) लागू होने के बावजूद, जो सुरक्षा बलों को व्यापक शक्तियाँ देता है, इस तरह का हमला होना केंद्र सरकार की शून्य सहिष्णुता नीति पर सवाल उठाता है। क्या यह कानून केवल नागरिकों के दमन के लिए है, न कि आतंकवाद से निपटने के लिए?
नायक ने कहा कि वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद केंद्र सरकार ने दावा किया था कि कश्मीर में शांति और विकास का नया युग शुरू होगा। लेकिन यह हमला, जो हाल के वर्षों में नागरिकों पर सबसे बड़ा हमला है, दर्शाता है कि स्थिति बद से बदतर हुई है। इस घटना के बाद हरेक देशवासी यह माँग करता है कि इस हमले की उच्च स्तरीय और स्वतंत्र जाँच हो, जिसमें खुफिया और सुरक्षा विफलताओं की गहराई से पड़ताल की जाए।
जाँच समिति में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल हों। कहा कि केंद्र सरकार और खुफिया एजेंसियों के उन अधिकारियों को दंडित करे जिनकी लापरवाही के कारण यह हमला संभव हुआ। गृह मंत्रालय को संसद और जनता के सामने जवाब देना होगा। मृतकों के परिजनों को तत्काल मुआवजा पांच करोड़ और पुनर्वास सहायता दी जाए।
घायलों के इलाज के लिए सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। पर्यटक स्थलों पर सुरक्षा बढ़ाई जाए, जिसमें आधुनिक तकनीक और खुफिया तंत्र का बेहतर उपयोग हो। साथ ही साथ कश्मीर के स्थानीय रहिवासियों की शिकायतों, जैसे गैर-स्थानीय रहिवासियों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट देने के मुद्दे को संवेदनशीलता से हल किया जाए, ताकि सामाजिक तनाव कम हो।
उन्होंने सभी नागरिकों, सामाजिक संगठनों और मीडिया से अपील करते हुए कहा कि वे इस मुद्दे पर एकजुट होकर केंद्र सरकार से जवाब माँगें। कश्मीर में शांति और पर्यटन को पुनर्जनन देने के लिए सुरक्षा और विश्वास दोनों जरूरी हैं। केंद्र सरकार की यह विफलता न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी धूमिल करती है।
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