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जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए बना झारखंड, आज उसपर सबसे बड़ा संकट

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। झारखंड राज्य का गठन जल, जंगल और जमीन की रक्षा के संकल्प के साथ हुआ था। आदिवासी अस्मिता, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और स्थानीय रहिवासियों के अधिकारों की रक्षा ही अलग राज्य आंदोलन की मूल आत्मा रही है। लेकिन आज, राज्य बनने के वर्षों बाद हालात इसके ठीक उलट दिखाई दे रहा है।

झारखंड के कई जिलों में जंगलों की अंधाधुंध कटाई, सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा और जमीन की खुलेआम खरीद–फरोख्त ने राज्य के मूल उद्देश्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
झारखंड के बोकारो सहित राज्य के अनेक क्षेत्रों में वन भूमि और सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्जा लगातार बढ़ता जा रहा है। जंगलों को उजाड़कर प्लॉटिंग की जा रही है, पेड़ काटे जा रहे हैं और आदिवासी व ग्रामीण इलाकों को धीरे-धीरे जंगल विहीन गांवों में बदला जा रहा है। यह सब कुछ प्रशासन की आंखों के सामने हो रहा है, जिससे आम जनता में भारी नाराजगी है।

बोकारो के तत्कालीन वन प्रमंडल पदाधिकारी (डीएफओ) रजनीश कुमार ने विभागीय जमीन को भू-माफियाओं से मुक्त कराने के लिए कई सख्त और सराहनीय कदम उठाए। अवैध कब्जों पर कार्रवाई, जमीन चिन्हित करना और वन भूमि की सुरक्षा के लिए की गई उनकी पहल ने माफियाओं की नींद उड़ा दी थी। हैरानी की बात यह है कि जमीन बचाने की दिशा में प्रभावी कार्रवाई करने वाले अधिकारी का ही स्थानांतरण कर दिया गया। यह स्थानांतरण अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। क्या ईमानदारी से काम करना अब अपराध बन गया है? क्या भू-माफियाओं का वर्चस्व इतना मजबूत हो चुका है कि वे प्रशासनिक फैसलों को भी प्रभावित कर रहे हैं?

आम जनों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि भू-माफियाओं के सरकार और सिस्टम के कुछ हिस्सों से मधुर संबंध हैं, जिसके कारण उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई टिक नहीं पा रही है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि अगर यही रवैया जारी रहा, तो आने वाले दिनों में झारखंड के कई गांव जंगल विहीन हो जाएंगे। इसका सीधा असर न केवल पर्यावरण पर पड़ेगा, बल्कि आदिवासी जीवन, जल स्रोतों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।

जनता अब सरकार से यह जानना चाहती है कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा का वादा केवल नारों तक ही सीमित रहेगा या वास्तव में ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देकर भू-माफियाओं पर लगाम लगाई जाएगी। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो झारखंड अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी पहचान जंगल और जमीन दोनों खो सकता है।

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