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जसम ने स्मृति दिवस पर संस्थापक महासचिव कवि गोरख पांडेय को किया याद

एस. पी. सक्सेना/समस्तीपुर (बिहार)। कवि व् साहित्यकार गोरख पांडेय ने अपनी लेखनी के माध्यम से जन सामान्य के सोंच को आगे बढ़ाया है। फासीवादी ताकतें एकजुट है, एक दूसरे को समर्थन देता है तो समाजवादी बुद्धिजीवियों को भी एक फ्रंट पर आकर जन संघर्ष तेज करना चाहिए। इस देश में जनसाधारण के आवाज को आगे ले जाने की जरूरत है।

देश में परिवर्तन जरूरी है। परिवर्तन विकास के लिए होना चाहिए। फासीवाद एवं सामंतवाद खत्म नहीं हुआ है। गोरख पांडेय की रचना में भारत का ग्राम्य जीवन की प्रधानता है। वे चरित्र को गांव से उठाते थे। हर युग में लेखक परिवर्तनकामी रहा है। इसलिए समाज की सच्चाई सामने आने लगा, जो लेखक के लिए महत्वपूर्ण है। लेखक के पास अपने विचार भी होते हैं जो जनपक्ष की ओर जाता है और उनका नाम होता है गोरख पांडेय।

गोरख पांडेय जो देखते थे, वही लिखते थे। साहित्य का ज्ञान ही काफी नहीं है, संघर्ष को समझने के लिए बल्कि जीवन का अनुभव भी जरूरी है। साहित्य चीजों को देखते हैं, समझते हैं और अच्छे विचारों से लैस होते हैं। गोरख पांडेय को हम भूल नहीं सकते। गोरख पांडे के मशहूर पंक्ति को कोट करते हुए कहा कि ये आंखें है तुम्हारा तकलीफ का समंदर, इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देनी चाहिए। गोरख पांडेय साहित्यकारों को एक क्रांतिकारी मंच पर लाना चाहते थे। हमें उनकी लेखनी से प्रेरणा लेकर सांस्कृतिक मोर्चा को और अधिक मजबूत बनाने की ओर बढ़ना चाहिए।

उक्त बातें अपने अध्यक्षीय संबोधन में जसम के समस्तीपुर जिलाध्यक्ष डॉ प्रभात कुमार ने 29 जनवरी को शहर के मालगोदाम चौक स्थित भाकपा माले कार्यालय में जसम के संस्थापक महासचिव कवि गोरख पांडेय के स्मृति दिवस पर समाज के विकास में साहित्यकारों की भूमिका और गोरख पांडेय विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा।

गोष्ठी की अध्यक्षता जसम के जिला सचिव अमलेंदू कुमार ने किया। इस अवसर पर रामदयाल राय, अवधेश दास, चंद्रशेखर प्रसाद राय, अरविंद आनंद, वंदना श्रीवास्तव, अरूण अभिषेक, विद्यानंद दास, डॉ खुर्शीद खैर, कासिम सबा, संगीता कुमारी, लोकेश राज, सुरेंद्र प्रसाद सिंह, दीपक यदुवंशी, बंदना सिंह, महेश पासवान, अनील चौधरी समेत अन्य वक्ताओं ने गोष्ठी में अपने विचार व्यक्त किए।

बतौर अतिथि जनवादी लेखक संघ के जिलाध्यक्ष शाह जफर ईमाम ने कहा कि गोरख पांडे ने अपने कलम की लेखनी से देश के करोड़ों जन मानस को प्रेरित किया है। उन्होंने मैक्सिम गोर्की के उपन्यास मां की चर्चा करते हुए कहा कि जब बेटे को जेल में बंद कर दिया जाता है तो मां जेल जाकर बेटे से पर्चा लिखवाकर जनता के बीच बांटती है। इससे यह प्रतीत होता है कि मां की भूमिका क्रांति में भी होती है। उन्होंने कहा कि गोरख पांडेय तत्कालीन समाज में फैले कुरितियों पर सीधा प्रहार करते थे।

वे जब दिल्ली से लौटते थे तो घर में रहने के बजाय किसान- मजदूरों के बीच रहकर विषमता, अन्याय, सामंती प्रवृत्ति, छूआछूत, अशिक्षा आदि के खिलाफ जागरूकता फैलाते थे। कहा कि गोरख पांडेय भी अन्य कवियों, कथाकार, नाटककार के तरह समाज में व्यापक बदलाव की आकांक्षा संजोए अपनी लेखनी के माध्यम से आईना दिखा रहे थे।

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