रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। चुनाव के समय सभी राजनीतिक पार्टी आदिवासी-मूलवासी, हिंदू-मुसलिम चिल्लाते है, लेकिन वोट लेकर पांच साल के लिए रफू चक्कर हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण चुनाव के दौरान आदिवासी, सरना कोड, कुड़मी, ओबीसी आरक्षण, मुस्लिम, कब्रिस्तान तथा सरना स्थल घेराबंदी के नाम पर राजनीति करना।
जबकि ऐसे जातिवाद और धर्म की राजनीति का विकल्प है झारखंड के दस राजनीतिक दलों का गठबंधन जनमत। उक्त बातें जनमत नेता इमाम सफी ने 11 सितंबर को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कही।
जनमत नेता सफी ने कहा कि आदिवासी के नाम पर आज तक राज्य में 13 बार मुख्यमंत्री बनाया गया, जिसमें एक को छोड़कर सब आदिवासी बनें, लेकिन अपने परिवार को छोड़कर किसी अन्य आदिवासी का भला नहीं किया। सबसे बड़ी आश्चर्य की बात, जिसके विरुद्ध झारखंड बना उसी का सबसे ज्यादा लाभ हुआ है।
आज बीजेपी में सबसे ज्यादा छ: आदिवासी पुर्व मुख्यमंत्री मौजूद हैं, लेकिन मजाल है किसी मुख्यमंत्री का जो आदिवासी का पहचान सरना कोड की मांग करे। इधर आदिवासी के मसीहा माने जाने वाले नेता शिबू सोरेन व उनके पुत्र हेमंत सोरेन तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं, लेकिन कोई बता दें कि आदिवासी बंधुओं के लिए अमुख काम किया है।
इससे तो अच्छा अंग्रेज थे जो आदिवासी जमीन की सुरक्षा के लिए सीएनटी/एसपीटी अधिनियम लागू कर दिया था। अन्यथा पता चलता कि सभी आदिवासी मुख्यमंत्री ने सभी आदिवासी जमीन हड़प ली है।
सफी ने कुड़मी राजनीति को लेकर कहा कि इधर आदिवासी के बाद सबसे बड़ी आबादी वाली कुडमी समूदाय के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले मौसम वैज्ञानिक सुदेश महतो भी सबसे ज्यादा समय तक सरकार में रहे, लेकिन कोई भी कार्य कुड़मी के हित में नहीं किया। कुछ किया तो ओबीसी का आरक्षण 27 प्रतिशत से घटा कर 14 प्रतिशत कर दिया। साथ हीं 1985 वाली नियोजन नीति का उन्होंने समर्थन किया।
इसी कड़ी में मुस्लिम राजनीति के संबंध में उन्होंने कहा कि कुडमी की आबादी के लगभग बराबर आबादी वाले मुसलमानों के रहनुमा स्व घोषित पुर्व मंत्री आलमगीर आलम, भाग्यशाली मंत्री हफीजुल हसन, मौका परस्त सांसद सरफराज अहमद व बड़बोला मंत्री इरफान अंसारी ने मुसलिम वोट तो पेटी भर-भर के लिया, लेकिन समाज के लिए कब्रिस्तान घेराबंदी के अलावे कोई काम नहीं किया।
इससे अच्छा तो पीटु- चिंटू है, जो अघोषित रुप से झारखंड में शासन कर रहे हैं और अपनों के लिए अनुकूल नीति नियमावली बना रहे हैं। इसलिए सभी झारखंडी आदिवासी-मूलवासी जनता से आग्रह है कि जाति, धर्म की राजनीति से बाहर निकल कर एकजूटता का परिचय दें। बेईमान नेताओं को सबक सीखाएं और एक नया विकल्प बनें। वरना झारखंड भारत का सबसे अमीर राज्य देखते- देखते सबसे गरीब राज्य में बदल जाएगा।
उन्होंने कहा कि एक बार यहां की जल, जंगल, जमीन व खनिज संपदा खत्म हो गया तो फिर हमेशा के लिए दरिद्रता के गर्त में समा जायेगा। अभी भी समय है झारखंड को बचाने के लिए एकजुट होना पड़ेगा। इसका सबसे अच्छा विकल्प है जनमत।
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