गुरु के बिना ज्ञान और मोक्ष पाना असंभव-जगद्गुरु स्वामी लक्ष्मणाचार्य

सोनपुर के साधु गाछी में गुरु पूर्णिमा और नारायणी महोत्सव संपन्न

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में हरिहरक्षेत्र सोनपुर के साधु गाछी स्थित श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम् नौलखा मन्दिर में 3 जुलाई आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा एवं नारायणी महोत्सव उत्साह पूर्वक मनाया गया।

नारायणी महोत्सव पर हरिहर क्षेत्र पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने गाय के दूध से मोक्षदायिनी नारायणी का एवं 108 शालीग्राम भगवान का अभिषेक किया। इस अवसर पर यहां नारायणी माता के आरती का दृश्य बहुत ही मनोरम था।

इस अवसर पर गजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम् में गुरु पर्व मनाते हुए स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि भारत वर्ष में कई विद्वान गुरु हुए हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास प्रथम विद्वान थे, जिन्होंने सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के चारों वेदों की व्याख्या की थी। उन्होंने कहा कि सिख धर्म केवल एक ईश्वर और अपने दस गुरुओं की वाणी को ही जीवन का वास्तविक सत्य मानता है।

सिख धर्म की एक प्रचलित कहावत गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पांव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए। उन्होंने कहा कि आषाढ़ पूर्णिमा को आदि गुरु वेद व्यास का जन्म हुआ था। उनके सम्मान में ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। मगर गूढ़ अर्थों को देखना चाहिए क्योंकि आषाढ़ मास में आने वाली पूर्णिमा तो पता भी नहीं चलती है।

आकाश में बादल घिरे हो सकते हैं और बहुत संभव है कि चंद्रमा के दर्शन तक न हो पाएं। बिना चंद्रमा के कैसी पूर्णिमा? इसकी कल्पना की जा सकती है। चंद्रमा की चंचल किरणों के बिना तो पूर्णिमा का अर्थ ही भला क्या रहेगा। अगर किसी पूर्णिमा का जिक्र होता है तो वह शरद पूर्णिमा का होता है।

ऐसे में शरद पूर्णिमा को क्यों न श्रेष्ठ माना जाए, क्योंकि उस दिन चंद्रमा की पूर्णता मन मोह लेती है। मगर महत्व तो आषाढ़ पूर्णिमा का ही अधिक है, क्योंकि इसका विशेष महत्व है।

गुरु के सम्मान में हर साल आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरु पर्व मनाया जाता है। यह गुरु के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन होता है, क्योंकि गुरु ही शिष्य का मार्ग दर्शन करते हैं। वे ही जीवन को ऊर्जामय बनाते हैं। गुरु के बिना ज्ञान और मोक्ष दोनों ही प्राप्त करना असंभव है।
हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा पर गुरु की पूजा करने की परंपरा है।

शास्त्रों में गुरु को भगवान से ऊपर का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरुओं और बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए। साथ ही गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरुओं की पूजा और उनका सम्मान करते हुए उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

इस प्रकार सैकड़ों शिष्यों ने अपने गुरु महाराज स्वामी लक्ष्मणाचार्य की पूजा अर्चना व् आरती कर प्रसाद ग्रहण किया। इसके पूर्व स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने अपने गुरु जगदाचार्य त्रिदण्डी स्वामी की पादुका पूजन, आरती कर तैल चित्र का माल्यार्पण किये।

महामहोत्सव में अधिवक्ता सह मन्दिर ट्रस्ट सदस्य विश्वनाथ सिंह, अधिवक्ता अभय कुमार सिंह, सुनील कुमार यादव, संजीत कुमार, रामेश्वर कुमार आदि की उपस्थिति ने मनोहर दृश्य बना दिया। उपर्युक्त अवसर पर मन्दिर प्रबंधक नन्द कुमार राय, समाजसेवी लाल बाबू पटेल, दिलीप झा, फूल झा, भोला सिंह आदि ने सभी श्रद्धालुओं को महाप्रसाद खिलाने में सहयोग कर उनके बीच तिरुपति बालाजी के तर्ज पर लड्डू का वितरण किया।

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