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सत्ययुग से ही है जल यात्रा की परम्परा-जगद्गुरु स्वामी लक्ष्मणाचार्य

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। श्रीगजेंद्र मोक्ष देवस्थानम दिव्य देश पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य जी महाराज ने सारण जिला के हद में सोनपुर के साधु गाछी में 27 जनवरी को श्री गजेन्द्रमोक्ष देवस्थानम दिव्यदेश घाट पर नौलखा मंदिर यज्ञशाला में आयोजित श्री ब्रह्मोत्सव सह श्रीलक्ष्मी नारायण यज्ञ के अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित किया।

उन्होंने जल यात्रा के महत्त्व पर कहा कि सत्ययुग से ही जल यात्रा की परम्परा रही है। आध्यात्मिक जगत में किसी भी अनुष्ठान यज्ञादि करने के लिए सर्वप्रथम जल यात्रा किया जाता है। सभी कार्य जल से ही पूर्ण होते हैं। जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन अधूरा है।

उन्होंने कहा कि संसार के सभी प्राणियों को शुद्ध करने का काम वरुण देवता करते हैं। बिना वरुण देवता का पूजन किए संसार का कोई कर्म सफल नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जिसके घर में वास्तु दोष हो तो दरवाजे पर जलपूरित कलश रखने से वास्तुदोष समाप्त हो जाता है। गर्भाधान से मृत्यु पर्यन्त तक जितने भी षोडश संस्कार हैं सब में जल की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि कुआं से श्रेष्ठ बावड़ी का जल, बावड़ी के जल से श्रेष्ठ नदी का जल, नदी से श्रेष्ठ संगम का जल होता है। इसलिए सभी पवित्र कर्मों में जल यात्रा का विधान है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीवामन के चरणों से गंगा निकली है इसलिए गंगा सर्वोत्तम है। इस अवसर पर रात्रि 9 बजे मृत्तिका संग्रह (मटकोर), कुदाल का पूजन हुआ। मिट्टी में अंकुर-रोपण किया गया।

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