रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। क्षेत्रीय पार्टी को अपने प्रदेश में संगठन को मजबूत करने में पार्टी के शीर्ष नेता एड़ी चोटी कर देते हैं। वहीं राष्ट्रीय पार्टी के नेता द्वारा क्षेत्रीय पार्टी के अंदर घुसकर क्षेत्रीय पार्टी को कमजोर करने का काम किया जाता है।
झारखंड अलग राज्य के निर्माण को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा के अगुवाई में आंदोलन किया गया। इस आंदोलन को शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो, सूरज मंडल, शैलेंद्र महतो जैसे दिग्गज नेताओं के द्वारा आंदोलन तेज किया गया था। झारखंड से खनिज संपदा को बाहर जाने से रोका गया। इस आंदोलन में कितने आंदोलनकारी शहीद हुए। उसके बाद भी झारखंड अलग राज्य के लिए आंदोलन कम नहीं हुआ।
आंदोलन के दौरान कई बार झामुमो के कद्दावर नेता जेल गए, लेकिन उसके बाद भी आंदोलन कम नहीं हुआ। अंततः केंद्र सरकार को झुकना पड़ा। इस आंदोलन को देखते हुए अलग राज्य की घोषणा करना पड़ा, तब जाकर अलग राज्य की पहचान झारखंड को मिला। क्षेत्रीय पार्टी के रूप में झामुमो और आजसू संगठन काफी मजबूत हो चुका था, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी का खेल से झारखंड के क्षेत्रीय पार्टी को कुचलने का ही काम किया गया।
आज 24 साल के झारखंड अलग राज्य होने के बाद से राष्ट्रीय पार्टी द्वारा क्षेत्रीय पार्टी को कुचलने का ही काम किया जा रहा है। भाजपा द्वारा आजसू के संगठन को खत्म करने का षड्यंत्र हो रहा है। वहीं कांग्रेस द्वारा झामुमो के संगठन को भी धीरे-धीरे तोड़ने का काम किया जा रहा है।
दोनों क्षेत्रीय पार्टी अपने बलबूते पर चुनाव मैदान में रहती तो झारखंड में सरकार कभी झारखंड मुक्ति मोर्चा का होता तो कभी आजसू का होता। लेकिन, क्षेत्रीय पार्टी का सोंच के अभाव के चलते राष्ट्रीय पार्टी झारखंड प्रदेश में राज कर रही है। अभी भी समय है क्षेत्रीय पार्टी को एक जूट होने का। समर्थन किसी राष्ट्रीय पार्टी को नहीं देने का।
झारखंड में झामुमो, आजसू का अलग पहचान बना था। संगठन काफी मजबूत हुआ करता था, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी के चंगुल में फंसकर क्षेत्रीय पार्टी का जनाधार कम होता दिख रहा है। इसी तरह झारखंड के दो बड़े आदिवासी नेता ने जल्दबाजी में एक को संसद में जाने का और एक को जल्दबाजी है झारखंड का मुख्यमंत्री बनने का।
उन्हें सपना दिखाया गया। झारखंड में राष्ट्रीय पार्टी को सबक सिखाने के लिए सूर्य सिंह बेसरा द्वारा नई पार्टी का गठन कर झारखंड प्रदेश को बचाने का काम इनके नेतृत्व में होने की संभावना प्रबल हो गई है। आगामी विधानसभा चुनाव में फिर बैसाखी के सहारे में सरकार बनना तय है। जब तक पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनेगी, तब तक झारखंड प्रदेश का सही विकास नहीं होगा।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के दो दिग्गज नेता चंपाई सोरेन तथा सीता सोरेन के झामय छोड़कर भाजपा में चले जाने के बाद झारखंड का राजनीतिक तापमान बढ़ चुका है। झारखंड में गुटबाजी चरम सीमा पार कर चुका है। झामुमो का हो या आजसू का। चाहे बीजेपी, चाहे कांग्रेस का। झारखंड में विधानसभा चुनाव में अपने-अपने दावेदारी पार्टी के वरीय कार्यकर्ता कर रहे हैं।
वे आपस में भी उलझ रहे हैं।भाजपा के कई कार्यकर्ता वर्तमान विधायक के विरोध में चुनाव में अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस के कई दिग्गज नेता आपस में उलझ रहे हैं। झामुमो के कद्दावर नेता एक और संगठन मजबूत करने में लगे है।
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