धरती गगन में होती है तेरी जय जयकार, हो मैया तेरी जय जयकार
दुर्गा सप्तशती पाठ से पवित्रमय हुआ वातावरण
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। धरती गगन में होती है तेरी जय जयकार, हो मैया तेरी जय जयकार से शारदीय नवरात्र में सारण जिला के हद में सोनपुर अंचल के डुमरी बुजुर्ग गांव में सप्तम देवी दुर्गा कालरात्रि की जय जयकार हो रही है।
पूजा पंडालो में हवन के साथ दुर्गा सप्तशती पाठ से वातावरण में पवित्रता का बोध हो रहा है। सर्वत्र या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: का मंत्र जाप चल रहा है। कोई भक्त देवी को ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः सिद्ध मंत्र से प्रसन्न करने में तल्लीन है तो कोई ॐ देवी कालरात्र्यै नमः मंत्र के जाप से भय, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति पाने के लिए माता की स्तुति कर रहा है।
स्वयं ब्रह्माजी ने भी की है देवी कालरात्रि की स्तुति
ध्यान देने योग्य है कि दस महाविद्याओं में प्रथम काली ही सप्तम दुर्गा काल रात्रि हैं। दुर्गा सप्तशती में स्वयं ब्रह्माजी ने इन्हें स्थिति एवं संहार की कारणभूता, महाविद्या, महामाया, महास्मृति, तीनों गुणों को उत्पन्न करनेवाली प्रकृति, भयंकर कालरात्रि आदि कहकर स्तुति की है। श्रीदेव्यथर्वशीर्षम के 11वें श्लोक में कालरात्रि को काल का भी नाश करने वाली पाप नाशिनी, कल्याण कारिणी भगवती कहकर स्तुति की गई है।

इन्हें दुर्गति नाशिनी कोटि – कोटि ब्रह्मांडो की जननी व सर्व शक्तिमयी विश्वमाता कहा गया है। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के सुंदर कांड के 34 से 35वें श्लोक में रावण के लिए देवी कालरात्रि ने जगद जननी सीता के रूप में जन्म लिया था। उन्हीं के कारण सम्पूर्ण लंका का विनाश एवं रावण के कुल का नाश हुआ था।
डुमरी बुजुर्ग गांव में है देवी कालरात्रि का स्थान
पटना- छपरा एनएच 19 के ठीक बीचों-बीच बाबा हरिहरनाथ एवं मां अम्बिका भवानी के मध्य में सारण गढ़ के ऊंचे डीह पर माता काल रात्रि का पवित्र स्थान है। जिस पर भव्य मंदिर बना है। उस मंदिर में माता का दरबार लगा है। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित मां दुर्गा के सप्तम स्वरूप मां कालरात्रि यही हैं। यहीं पर मही नदी गंगा से संगम करती है। मंदिर के अर्चक पंडित ब्रजेशानंद मिश्र बताते हैं कि यह मनोकामना सिद्ध पीठ है। माता की शरण में निश्छल मन से शरणागत होकर मन्नत मांगने वाले भक्तों की माता मन्नत पूर्ण करती हैं। इसी वजह से इसे मनोकामना सिद्ध पीठ के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है। अर्चक मिश्र के अनुसार यहां दूर – दराज से भक्तगण आते हैं और अपनी मनोकामना की सिद्धि के लिए माता से प्रार्थना करते हैं। यह एक जागृत पीठ है।
कालरात्रि मंदिर समिति के अध्यक्ष विजय सिंह बताते हैं कि जिन भक्तों की मन्नत पूरी होती है वे मन्नत पूर्ण होते ही माता के दरबार में आकर 22 मीटर की चुनरी चढ़ाते हैं। कहा कि माता की विशेष पूजा भादो -अमावस्या की रात में होती है। सबसे बड़ी खास बात यह है कि नवरात्रि में माता की भक्ति में सभी ग्रामवासी समर्पित हो जाते हैं।
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