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मैं वैरी सुग्रीव प्यारा, अवगुण कौन नाथ मोहि मारा,बाली-श्रीराम वार्ता पर दर्शक उद्वेलित

सोनपुर में सांस्कृतिक संगम रामायण मंचन का छठा दिन

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में विश्व प्रसिद्ध हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेला में सांस्कृतिक संगम सलेमपुर की प्रस्तुति रामायण मंचन के छठे दिन 27 नवंबर की शुरुआत राम- हनुमान मिलन से होती है।

मेला के मंच पर राष्ट्र प्रसिद्ध रंग कर्मी मानवेंद्र त्रिपाठी के निर्देशन में चल रहे रामायण मंचन में तब और रोचकता बढ़ जाती है, जब किष्कीन्धा के राजा बालि के भय से दर-बदर भटकते अनुज सुग्रीव अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री हनुमान को ऋष्यमुख पर्वत के पास भटकते दो युवकों के विषय में पता लगाने का दायित्व सौंपते हैं। सबको शंका होती है कि कहीं बालि ने सुग्रीव के वध के लिए दो युवकों को भेजा हो।

तब हनुमानजी अपने बुद्धि का प्रयोग करते हुए वेष बदल कर एक पुरोहित के रूप में राम-लक्ष्मण से मिलते हैं। बड़ी चतुराई के साथ अपने बुद्धि कौशल का प्रयोग करते हुए प्रभु राम की परीक्षा लेने की कोशिश करते हैं। लेकिन प्रभु राम की विनम्रता के सम्मुख स्वयं को लज्जित महसूस करते हैं। वे कहते हैं कि भक्त से उस समय बड़ी भूल हो जाती है, जब प्रभु की परीक्षा लेने की कोशिश करता है।

ईश्वर को पाने के लिए बुद्धि नहीं बल्कि हृदय की पड़ती हैं जरूरत

जब तक हनुमानजी बुद्धि लगाते हैं, तब तक अपने आराध्य भगवान श्रीराम को पहचान नहीं पाते। फिर जब बुद्धि के तल से हट कर हृदय के तल पर उतरते हैं तो उन्हें प्रभु का दर्शन होता हैं। यह प्रसंग बताता है कि ईश्वर को पाने के लिए बुद्धि नहीं बल्कि हृदय की जरूरत पड़ती है।

इसी कड़ी में एक और प्रसंग मरणासन्न बालि वध में बालि का प्रश्न मैं वैरी सुग्रीव प्यारा, अवगुण कौन नाथ मोहि मारा प्रश्न के उत्तर में श्रीराम कहते हैं कि अनुज की भार्या पुत्री के समान होती है और तुमने अपने अनुज की पत्नी को बलात अपनी स्त्री बनाने का अक्षम्य पाप किया है। तुमने समाज के विधि -विधान नियम कानून को तोड़ कर अराजकता पैदा किया है।

अतः तुम्हारा अपराध क्षमा योग्य नहीं है। बालि अपने अपराध को स्वीकार करते हुए अपने पुत्र अंगद को श्रीराम के हाथों सौंप देता है। इसी क्रम में सुग्रीव हनुमानजी को सीताजी की खोज में लंका की तरफ भेजते हैं, जहां हनुमानजी की मुलाकात लंकिनी से होती है। हनुमानजी के एक प्रहार से लंकिनी मूर्छित हो जाती है। तब लंकिनी को ब्रह्माजी द्वारा की गई भविष्यवाणी याद आ जाती है। जब किसी वानर के एक प्रहार से लंकिनी मूर्छित हो जाएगी फिर समझ लेना लंका का विनाश निश्चित है। इस प्रसंग के बाद हनुमानजी की लंका में दूसरी मुलाकात विभीषण से होती है जो उन्हें अशोक वाटिका में रावण द्वारा सीताजी को कैद रखने की सूचना देते हैं।

विभीषण की सूचना पाकर हनुमानजी अशोक वाटिका में जाकर सीताजी को प्रभु श्रीराम का संदेश और रामचंद्र द्वारा दी गई मुद्रिका देते हैं। उसके उपरांत सीताजी से आज्ञा लेकर भूख मिटाने और रावण की शक्तियों की थाह लेने के लिए अशोक वाटिका विध्वंस करते हैं। फिर मेघनाथ द्वारा चलाये गए ब्रह्मास्त्र में बंधकर रावण के सम्मुख उपस्थित होते हैं। रावण को प्रभु श्रीराम के शरणागत होने की सलाह देतें हैं। रावण उनकी सलाह न मानकर उल्टे उनकी पूंछ में आग लगाने का आदेश देता है। हनुमानजी अपनी पूंछ में लगी आग से पूरी लंका को जलाकर राख कर देते हैं।

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