एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड की राजधानी रांची स्थित रिम्स प्रभावित परिवारों को इस्लामनगर के तर्ज पर तत्काल राहत और मानवीय आधार पर समयबद्ध पुनर्वास नीति के तहत स्थायी आवास की व्यस्था करे राज्य के हेमंत सोरेन सरकार। उपरोक्त बाते 16 दिसंबर को आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने कही।
उन्होंने कहा कि झारखंड में विकास और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच संवैधानिक न्याय आज कठघरे में खड़ा है। इस्लामनगर में उजड़े परिवारों को जहाँ प्रशासन ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आंशिक राहत और अस्थायी आश्रय दिया, वहीं रिम्स परिसर के आसपास रहने वाले सैकड़ों गरीब परिवार खास कर दलित आदिवासी मूलवासी समाज, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग शामिल हैं, एक ही झटके में बेघर कर दिए गए। ठिठुराती सर्दी में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के यह कार्रवाई समानता और मानवीय गरिमा के संवैधानिक सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष नायक ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 समान परिस्थितियों में समान व्यवहार की गारंटी देता है। इस्लामनगर को मिला आंशिक पुनर्वास, जबकि रिम्स विस्थापितों की पुकार अनसुनी कर दी गई। राजधानी रांची में अतिक्रमण हटाने के दो मामले इस्लामनगर और रिम्स परिसर दिल दहलाने वाली सच्चाई उजागर करते हैं। कहा कि एक तरफ इस्लामनगर के परिवार, जो वर्ष 2011 में बेघर हुए, कोर्ट की मानवीय दृष्टि से आंशिक पुनर्वास मिला था। क्या एक ही राज्य में न्याय के दो मापदंड होंगे? दोनों मामले कानून की नजर में अतिक्रमण हैं, लेकिन अंतर कोर्ट के विवेक और मामले की प्रकृति से आया। मानवीय रूप से दोनों स्थिति में गरीब परिवार प्रभावित हैं। एक में आंशिक न्याय तथा दूसरे में पूर्ण बेबसी। यह समाजिक न्याय के सिद्धांतों की उपेक्षा करता है।
नायक ने कहा कि रिम्स के सैकड़ों परिवार रातों रात उजाड़ दिए गए। ठंड की क्रूर सर्दी में बच्चे काँप रहे हैं। मातायें आंसू बहा रही हैं। बुजुर्ग बेबस होकर आसमान ताक रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने अस्पताल सुधार को प्राथमिकता दी, लेकिन इन मासूमों की चीखें अनसुनी रह गईं। क्या कानून की रक्षा गरीबों की आहों पर ही होगी? दोनों ही मामले गरीबी की मजबूरी से उपजे है। दोनों मामलों में मासूम बच्चे और मेहनतकश गरीब, गुरबे प्रभावित हुए है। इस्लामनगर में कोर्ट ने इंसानियत को जगह दी, तो रिम्स में ऐसा क्यों नहीं हुआ? ये परिवार झारखंड के अपने हैं।
क्या उनकी पीड़ा कम है ? वे झारखंड सरकार और माननीय हाईकोर्ट से दिल से अपील करते है कि रिम्स विस्थापितों की भी पुकार को सुनी जाय और तुरंत अस्थायी आवास और पुनर्वास की व्यवस्था करने की दिशा में ठोस पहल किये जाय।उन्होंने कहा कि इस्लामनगर की तरह मानवीय हस्तक्षेप से उनकी भी आंसुओं को पोंछिए। कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन गरीबों की गरीबी और बेबसी पर नहीं। यह इंसानियत का समय है। सभी को समान न्याय मिले, आज इसकी जरूरत है।
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